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Vikram Sharma
vaqt ka dariyaa to ham paar nahin kar sakte
vaqt ka dariyaa to ham paar nahin kar sakte | वक़्त का दरिया तो हम पार नहीं कर सकते
- Vikram Sharma
वक़्त
का
दरिया
तो
हम
पार
नहीं
कर
सकते
करना
चाहे
भी
तो
हम
यार
नहीं
कर
सकते!
भूल
जाना
भी
कोई
काम
हुआ
करता
है?
काम
ये
आपके
बीमार
नहीं
कर
सकते!
क्यूँँ
सदा
ढूँढने
होते
है
बहाने
हम
को
क्यूँँ
कभी
खुल
के
हम
इनकार
नहीं
कर
सकते?
- Vikram Sharma
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उम्र-भर
के
सज्दों
से
मिल
नहीं
सकी
जन्नत
ख़ुल्द
से
निकलने
को
इक
गुनाह
काफ़ी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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हमारा
काम
तो
मौसम
का
ध्यान
करना
है
और
उस
के
बाद
के
सब
काम
शश-जहात
के
हैं
Pallav Mishra
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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हो
गई
है
पीर
पर्वत
सी
पिघलनी
चाहिए
इस
हिमालय
से
कोई
गंगा
निकलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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दरिया
के
किनारे
पे
मिरी
लाश
पड़ी
थी
और
पानी
की
तह
में
वो
मुझे
ढूँड
रहा
था
Adil Mansuri
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तुम्हारे
पाँव
क़सम
से
बहुत
ही
प्यारे
हैं
ख़ुदा
करे
मेरे
बच्चों
की
इन
में
जन्नत
हो
Rafi Raza
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ग़मों
की
सूई
में
यादें
पिरोकर
उदासी
ने
बुना
है
मेरा
स्वेटर
किसी
तन्हाई
का
बेताल
मुझ
सेे
है
लिपटा
नाम
के
धोके
में
आकर
तेरे
जज़्बों
को
लफ़्ज़ों
का
फ़लक
दे
क़फ़स
से
इन
परिंदों
को
रिहा
कर
ज़ियादा
वज़्न
है
टूटे
न
कश्ती
बचा
ले
ख़ुद
को
तू
मुझको
गिराकर
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Vikram Sharma
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तुम
मुहब्बत
से
नहीं
मुझ
सेे
ख़फ़ा
हो
शायद
तुम
अगर
चाहो
तो
पिंजरा
भी
बदल
सकते
हो
मुंतज़िर
हूँ
मैं
सो
नंबर
भी
नहीं
बदलूँगा
और
तुम
शहर
का
नक़्शा
भी
बदल
सकते
हो
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Vikram Sharma
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किस
काम
के
वो
फूल
जो
सबने
दिए
मुझे
बेहतर
है
तेरे
हाथ
का
ख़ंजर
लगे
मुझे
Vikram Sharma
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कौन
निकले
घर
से
बाहर
रात
में
सो
गए
हम
अपने
अंदर
रात
में
फिर
से
मिलने
आ
गईं
तन्हाइयाँ
क्यूँ
नहीं
खुलते
हैं
दफ़्तर
रात
में
हम
जुटा
लेते
हैं
बिस्तर
तो
मगर
रोज़
कम
पड़ती
है
चादर
रात
में
रोज़
ही
वो
एक
लड़की
सुब्ह
सी
जाती
है
हम
को
जगा
कर
रात
में
ख़्वाब
देखा
है
इसी
का
रात
भर
सोए
थे
जिस
को
भुला
कर
रात
में
ज़िंदगी
भर
की
कमाई
एक
रात
जो
मिली
ख़ुद
को
गँवा
कर
रात
में
साँप
दो
आते
हैं
हम
को
काटने
उस
की
यादें
और
ये
घर
रात
में
ज़िंदगी
की
रात
इक
दिन
ख़त्म
हो
ये
दु'आ
करते
हैं
अक्सर
रात
में
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Vikram Sharma
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अहले
दुनिया
नया
नया
हूँ
मैं
माज़रत,
ख़्वाब
देखता
हूँ
मैं
उसकी
तस्वीर
है
घड़ी
के
पास
हर
घड़ी
वक़्त
देखता
हूँ
मैं
इस
क़दर
तीरगी
का
क़ाइल
हूँ
धूप
को
धूप
कह
रहा
हूँ
मैं
है
परिंदों
से
ख़ामुशी
दरकार
पेड़
से
बात
कर
रहा
हूँ
मैं
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Vikram Sharma
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