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Vikas Sharma Raaz
koi us ke barabar ho gaya hai
koi us ke barabar ho gaya hai | कोई उस के बराबर हो गया है
- Vikas Sharma Raaz
कोई
उस
के
बराबर
हो
गया
है
ये
सुनते
ही
वो
पत्थर
हो
गया
है
जुदाई
का
हमें
इम्कान
तो
था
मगर
अब
दिन
मुक़र्रर
हो
गया
है
सभी
हैरत
से
मुझ
को
तक
रहे
हैं
ये
किया
तहरीर
मुझ
पर
हो
गया
है
असर
है
ये
हमारी
दस्तकों
का
जहाँ
दीवार
थी
दर
हो
गया
है
जिसे
देखो
ग़ज़ल
पहने
हुए
है
बहुत
सस्ता
ये
ज़ेवर
वो
गया
है
- Vikas Sharma Raaz
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बिछड़
गए
तो
ये
दिल
उम्र
भर
लगेगा
नहीं
लगेगा
लगने
लगा
है
मगर
लगेगा
नहीं
नहीं
लगेगा
उसे
देख
कर
मगर
ख़ुश
है
मैं
ख़ुश
नहीं
हूँ
मगर
देख
कर
लगेगा
नहीं
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Umair Najmi
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बिछड़
कर
मुझ
सेे
तुझको
क्या
मिला
है
कि
जो
कुछ
था
वो
भी
खोना
पड़ा
है
गया
था
जिस
जगह
पर
छोड़
कर
तू
उसी
रस्ते
पे
दिल
अब
भी
खड़ा
है
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ATUL SINGH
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बिछड़
के
तुझ
सेे
न
देखा
गया
किसी
का
मिलाप
उड़ा
दिए
हैं
परिंदे
शजर
पे
बैठे
हुए
Adeem Hashmi
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वो
एक
शख़्स
जो
दिखने
में
ठीक-ठाक
सा
था
बिछड़
रहा
था
तो
लगने
लगा
हसीन
बहुत
Siraj Faisal Khan
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हमारे
दरमियाँ
जो
प्यार
से
पहले
की
यारी
थी
बिछड़
कर
अब
ये
लगता
है
वो
यारी
ज़्यादा
प्यारी
थी
बिछड़ना
उसकी
मर्ज़ी
थी,
उसे
उतरन
न
कहना
तुम
वो
अब
उतनी
ही
उसकी
है
वो
तब
जितनी
तुम्हारी
थी
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Alankrat Srivastava
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तुम
सेे
बिछड़
जाने
का
ख़याल
अच्छा
है
क्योंकि
अभी
मेरा
भी
हाल
अच्छा
है
उसने
पूछा
तुम्हें
कितनी
महोब्बत
है
मुझ
सेे
मैंने
कहा
मालूम
नहीं
सवाल
अच्छा
है
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karan singh rajput
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दिल
को
तेरी
चाहत
पे
भरोसा
भी
बहुत
है
और
तुझ
से
बिछड़
जाने
का
डर
भी
नहीं
जाता
Ahmad Faraz
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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उस
सेे
तो
मैं
बिछड़
गया
अब
देख
ऐ
'पवन'
कब
दुनिया
आए
रास
यही
सोचता
रहा
Pawan Kumar
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मेरी
कोशिश
तो
यही
है
कि
ये
मासूम
रहे
और
दिल
है
कि
समझदार
हुआ
जाता
है
Vikas Sharma Raaz
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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सब
के
आगे
नहीं
बिखरना
है
अब
जुनूँ
और
तरह
करना
है
क्या
ज़रूरत
है
इतने
ख़्वाबों
की
दश्त-ए-शब
पार
ही
तो
करना
है
आ
गए
ज़िंदगी
के
झाँसे
में
ठान
रक्खा
था
आज
मरना
है
पूछना
चाहिए
था
दरिया
को
डूबना
है
कि
पार
उतरना
है
बैंड-बाजा
है
थोड़ी
देर
का
बस
रात
भर
किस
ने
रक़्स
करना
है
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Vikas Sharma Raaz
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रोज़
ये
ख़्वाब
डराता
है
मुझे
कोई
साया
लिए
जाता
है
मुझे
ये
सदा
काश
उसी
ने
दी
हो
इस
तरह
वो
ही
बुलाता
है
मुझे
मैं
खिंचा
जाता
हूँ
सहरा
की
तरफ़
यूँँ
तो
दरिया
भी
बुलाता
है
मुझे
देखना
चाहता
हूँ
गुम
हो
कर
क्या
कोई
ढूँड
के
लाता
है
मुझे
इश्क़
बीनाई
बढ़ा
देता
है
जाने
क्या
क्या
नज़र
आता
है
मुझे
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Vikas Sharma Raaz
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फिर
वही
शब
वही
सितारा
है
फिर
वही
आसमाँ
हमारा
है
वो
जो
ता'मीर
थी
तुम्हारी
थी
ये
जो
मलबा
है
सब
हमारा
है
वो
जज़ीरा
ही
कुछ
कुशादा
था
हम
ने
समझा
यही
किनारा
है
चाहता
है
कि
कहकशाँ
में
रहे
मेरे
अंदर
जो
इक
सितारा
है
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Vikas Sharma Raaz
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