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Alankrat Srivastava
hamaare darmiyaañ jo pyaar se pahle ki yaari thii
hamaare darmiyaañ jo pyaar se pahle ki yaari thii | हमारे दरमियाँ जो प्यार से पहले की यारी थी
- Alankrat Srivastava
हमारे
दरमियाँ
जो
प्यार
से
पहले
की
यारी
थी
बिछड़
कर
अब
ये
लगता
है
वो
यारी
ज़्यादा
प्यारी
थी
बिछड़ना
उसकी
मर्ज़ी
थी,
उसे
उतरन
न
कहना
तुम
वो
अब
उतनी
ही
उसकी
है
वो
तब
जितनी
तुम्हारी
थी
- Alankrat Srivastava
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नाप
रहा
था
एक
उदासी
की
गहराई
हाथ
पकड़कर
वापस
लायी
है
तन्हाई
वस्ल
दिनों
को
काफ़ी
छोटा
कर
देता
है
हिज्र
बढ़ा
देता
है
रातों
की
लम्बाई
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Tanoj Dadhich
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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रेल
की
सीटी
में
कैसे
हिज्र
की
तम्हीद
थी
उसको
रुख़्सत
करके
घर
लौटे
तो
अंदाज़ा
हुआ
Parveen Shakir
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आई
होगी
किसी
को
हिज्र
में
मौत
मुझ
को
तो
नींद
भी
नहीं
आती
Akbar Allahabadi
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हिज्र
में
इश्क़
यूँँ
रखा
आबाद
हिचकियांँ
तन्हा
तन्हा
लेते
रहे
Siraj Tonki
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बचा
के
आँख
बिछड़
जाएँ
उस
से
चुपके
से
अभी
तो
अपनी
तरफ़
ध्यान
भी
ज़ियादा
नहीं
Vipul Kumar
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मैं
न
कहता
था
हिज्र
कुछ
भी
नहीं
ख़ुद
को
हलकान
कर
रही
थी
तुम
कितने
आराम
से
हैं
हम
दोनों
देखा
बेकार
डर
रही
थी
तुम
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Mehshar Afridi
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बिछड़
गए
तो
ये
दिल
उम्र
भर
लगेगा
नहीं
लगेगा
लगने
लगा
है
मगर
लगेगा
नहीं
नहीं
लगेगा
उसे
देख
कर
मगर
ख़ुश
है
मैं
ख़ुश
नहीं
हूँ
मगर
देख
कर
लगेगा
नहीं
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Umair Najmi
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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ज़माने
में
दिखावे
के
सिवा
कुछ
भी
अगर
होता
सभी
फिर
चैन
से
जीते
सभी
के
पास
घर
होता
तुम्हारी
ही
मुहब्बत
ने
सिखाई
शा'इरी
वरना
बहुत
जी
जान
से
पढ़
कर
फ़क़त
इंजीनियर
होता
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Alankrat Srivastava
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ये
अजब
दौर
है,
सब
जहाँ
पर
अभी
"लिख
रहे"
हैं
ग़ज़ल
"कह
रहे
हैं"
नहीं
Alankrat Srivastava
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अगर
उसको
शिकायत
है
तो
ये
तय
है
मुहब्बत
है
बड़ी
अच्छी
है
सुनने
में
मगर
झूठी
कहावत
है
Alankrat Srivastava
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कौन
कहता
है
ये
दूर
मुझ
सेे
हो
तुम
तुम
सेे
रौशन
हूँ
मैं
नूर
मुझ
सेे
हो
तुम
Alankrat Srivastava
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है
इसी
सोच
में
कब
से
उर्दू
ज़ुबाँ
कह
सकेगा
ग़ज़ल
क्या
कोई
मीर
सी
Alankrat Srivastava
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