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Alankrat Srivastava
hai isee soch men kab se urdu zubaan
hai isee soch men kab se urdu zubaan | है इसी सोच में कब से उर्दू ज़ुबाँ
- Alankrat Srivastava
है
इसी
सोच
में
कब
से
उर्दू
ज़ुबाँ
कह
सकेगा
ग़ज़ल
क्या
कोई
मीर
सी
- Alankrat Srivastava
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तेरे
एहसास
को
ख़ुशबू
बनाते
जो
बस
चलता
तुझे
उर्दू
बनाते
यक़ीनन
इस
से
तो
बेहतर
ही
होती
वो
इक
दुनिया
जो
मैं
और
तू
बनाते
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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क्या
ख़ूब
तुम
ने
ग़ैर
को
बोसा
नहीं
दिया
बस
चुप
रहो
हमारे
भी
मुँह
में
ज़बान
है
Mirza Ghalib
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बोसा
देते
नहीं
और
दिल
पे
है
हर
लहज़ा
निगाह
जी
में
कहते
हैं
कि
मुफ़्त
आए
तो
माल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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है
नाज़
मुझको
अपनी
हिंदी
ज़बाँ
पे
यारो
हिंदी
हैं
हम
वतन
हैं
ये
देश
सब
सेे
आला
Dr Mohsin Khan
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रखे
है
लज़्ज़त-ए-बोसा
से
मुझ
को
गर
महरूम
तो
अपने
तू
भी
न
होंटों
तलक
ज़बाँ
पहुँचा
Jurat Qalandar Bakhsh
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मिल
गए
थे
एक
बार
उस
के
जो
मेरे
लब
से
लब
उम्र
भर
होंटों
पे
अपने
मैं
ज़बाँ
फेरा
किया
Jurat Qalandar Bakhsh
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गले
मिली
कभी
उर्दू
जहाँ
पे
हिन्दी
से
मिरे
मिज़ाज
में
उस
अंजुमन
की
ख़ुशबू
है
Satish Shukla Raqeeb
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मैं
हिंदी
और
उर्दू
को
अलग
कैसे
करूँँ
यारों
अगर
साँसें
हटा
दूँ
तो
बदन
में
कुछ
नहीं
बचता
Umesh Maurya
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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झूठों
से
तो
आप
को
काफ़ी
नफ़रत
है
फिर
क्यूँ
जी
सरकार
की
बातें
करते
हो
Alankrat Srivastava
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भरोसा
था
मुझको
न
बदलेगा
वो
पर
बदलते
सभी
हैं
यहाँ
हौले
हौले
Alankrat Srivastava
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बेगानी
इस
दुनिया
का,
ताना-बाना
सुन
उक्ता
के
उन
सेे
हिन्दी
का
इक
गाना
सुन
Alankrat Srivastava
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तुम्हें
इतना
जो
भाते
हैं
तुम्हारे
कान
के
झुमके
चलो
हम
भी
हो
जाते
हैं
तुम्हारे
कान
के
झुमके
बड़ी
शिद्दत
से
हौले
से
तुम्हारे
गाल
सहला
कर
मुझे
अक्सर
जलाते
हैं
तुम्हारे
कान
के
झुमके
अगर
है
चाँद
सी
सूरत
तुम्हारी
तो
सितारों
से
चमन
में
जगमगाते
हैं
तुम्हारे
कान
के
झुमके
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Alankrat Srivastava
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एक
जैसे
दिखने
वाले
सात
होते
हैं
मगर
उसके
जैसा
कोई
दूजा
भी
मुझे
दिखता
नहीं
Alankrat Srivastava
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