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Vikas Sharma Raaz
sab ke aage nahin bikhrna hai
sab ke aage nahin bikhrna hai | सब के आगे नहीं बिखरना है
- Vikas Sharma Raaz
सब
के
आगे
नहीं
बिखरना
है
अब
जुनूँ
और
तरह
करना
है
क्या
ज़रूरत
है
इतने
ख़्वाबों
की
दश्त-ए-शब
पार
ही
तो
करना
है
आ
गए
ज़िंदगी
के
झाँसे
में
ठान
रक्खा
था
आज
मरना
है
पूछना
चाहिए
था
दरिया
को
डूबना
है
कि
पार
उतरना
है
बैंड-बाजा
है
थोड़ी
देर
का
बस
रात
भर
किस
ने
रक़्स
करना
है
- Vikas Sharma Raaz
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ऐ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
हाँ
इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
आज
एक
सितमगर
को
हँस
हँस
के
रुलाना
है
Jigar Moradabadi
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उस
से
बढ़
कर
किया
मिलेगा
और
इनआम-ए-जुनूँ
अब
तो
वो
भी
कह
रहे
हैं
अपना
दीवाना
मुझे
Hafeez Banarasi
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उन्हीं
के
फ़ैज़
से
बाज़ार-ए-अक़्ल
रौशन
है,
जो
गाह
गाह
जुनूँ
इख़्तियार
करते
रहे
Faiz Ahmad Faiz
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कमी
न
की
तिरे
वहशी
ने
ख़ाक
उड़ाने
में
जुनूँ
का
नाम
उछलता
रहा
ज़माने
में
Firaq Gorakhpuri
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मेरी
अक्ल-ओ-होश
की
सब
हालतें
तुमने
साँचे
में
जुनूँ
के
ढाल
दी
कर
लिया
था
मैंने
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने
फिर
बाँहें
गले
में
डाल
दी
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Jaun Elia
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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मेरे
जुनूँ
का
नतीजा
ज़रूर
निकलेगा
इसी
सियाह
समुंदर
से
नूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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मुझ
से
कहा
जिब्रील-ए-जुनूँ
ने
ये
भी
वही-ए-इलाही
है
मज़हब
तो
बस
मज़हब-ए-दिल
है
बाक़ी
सब
गुमराही
है
Majrooh Sultanpuri
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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भोले
बन
कर
हाल
न
पूछ
बहते
हैं
अश्क
तो
बहने
दो
जिस
से
बढ़े
बेचैनी
दिल
की
ऐसी
तसल्ली
रहने
दो
Arzoo Lakhnavi
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दाग़
होने
लगे
ज़ाहिर
मेरे
तेज़
कर
रंग
मुसव्विर
मेरे
मेरी
आँखों
में
सियाही
भर
दे
या
हरे
कर
दे
मनाज़िर
मेरे
नुक़रई
झील
बुलाती
थी
उन्हें
फँस
गए
जाल
में
ताइर
मेरे
कौन
तहलील
हुआ
है
मुझ
में
मुंतशिर
क्यूँँ
हैं
अनासिर
मेरे
है
कहाँ
शंख
बजाने
वाला
कब
से
ख़ामोश
हैं
मंदिर
मेरे
संग
से
जिस्म
भी
कर
अब
मुझ
को
तू
कहाँ
खोया
है
साहिर
मेरे
लफ़्ज़
की
क़ैद-ओ-रिहाई
का
हुनर
काम
आ
ही
गया
आख़िर
मेरे
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Vikas Sharma Raaz
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इरादा
तो
नहीं
है
ख़ुद-कुशी
का
मगर
मैं
ज़िंदगी
से
ख़ुश
नहीं
हूँ
Vikas Sharma Raaz
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हवा
के
साथ
यारी
हो
गई
है
दिए
की
उम्र
लंबी
हो
गई
है
फ़क़त
ज़ंजीर
बदली
जा
रही
थी
मैं
समझा
था
रिहाई
हो
गई
है
बची
है
जो
धनक
उस
का
करूँँ
क्या
तिरी
तस्वीर
पूरी
हो
गई
है
हमारे
दरमियाँ
जो
उठ
रही
थी
वो
इक
दीवार
पूरी
हो
गई
है
क़रीब
आ
तो
गया
है
चाँद
मेरे
मगर
हर
चीज़
धुँदली
हो
गई
है
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Vikas Sharma Raaz
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कोई
उस
के
बराबर
हो
गया
है
ये
सुनते
ही
वो
पत्थर
हो
गया
है
जुदाई
का
हमें
इम्कान
तो
था
मगर
अब
दिन
मुक़र्रर
हो
गया
है
सभी
हैरत
से
मुझ
को
तक
रहे
हैं
ये
किया
तहरीर
मुझ
पर
हो
गया
है
असर
है
ये
हमारी
दस्तकों
का
जहाँ
दीवार
थी
दर
हो
गया
है
जिसे
देखो
ग़ज़ल
पहने
हुए
है
बहुत
सस्ता
ये
ज़ेवर
वो
गया
है
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Vikas Sharma Raaz
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दिल-खंडर
में
खड़े
हुए
हैं
हम
बाज़गश्त
अपनी
सुन
रहे
हैं
हम
मुद्दतें
हो
गईं
हिसाब
किए
क्या
पता
कितने
रह
गए
हैं
हम
जब
हमें
साज़गार
है
ही
नहीं
जिस्म
को
पहने
क्यूँँ
हुए
हैं
हम
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ुबूल
होंगे
उसे
रौशनी
के
लिए
नए
हैं
हम
वहशतें
लग
गईं
ठिकाने
सब
दश्त
को
रास
आ
गए
हैं
हम
धुन
तो
आहिस्ता
बज
रही
है
'राज़'
रक़्स
कुछ
तेज़
कर
रहे
हैं
हम
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Vikas Sharma Raaz
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