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Vikas Sharma Raaz
daagh hone lage zaahir mere
daagh hone lage zaahir mere | दाग़ होने लगे ज़ाहिर मेरे
- Vikas Sharma Raaz
दाग़
होने
लगे
ज़ाहिर
मेरे
तेज़
कर
रंग
मुसव्विर
मेरे
मेरी
आँखों
में
सियाही
भर
दे
या
हरे
कर
दे
मनाज़िर
मेरे
नुक़रई
झील
बुलाती
थी
उन्हें
फँस
गए
जाल
में
ताइर
मेरे
कौन
तहलील
हुआ
है
मुझ
में
मुंतशिर
क्यूँँ
हैं
अनासिर
मेरे
है
कहाँ
शंख
बजाने
वाला
कब
से
ख़ामोश
हैं
मंदिर
मेरे
संग
से
जिस्म
भी
कर
अब
मुझ
को
तू
कहाँ
खोया
है
साहिर
मेरे
लफ़्ज़
की
क़ैद-ओ-रिहाई
का
हुनर
काम
आ
ही
गया
आख़िर
मेरे
- Vikas Sharma Raaz
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मैं
हो
गया
हूँ
क़ैद
हज़ारों
रिवाज़
में
मुझको
मेरी
ही
ज़ात
ने
फलने
नहीं
दिया
shaan manral
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अजल
से
लेकर
अब
तक
औरतों
को
सिवाए
जिस्म
क्या
समझा
गया
है
Ali Zaryoun
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आज
मेरी
इक
ग़ज़ल
ने
उस
के
होंटों
को
छुआ
आज
पहली
बार
अपनी
शा'इरी
अच्छी
लगी
Siraj Faisal Khan
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बाग़-ए-बहिश्त
से
मुझे
हुक्म-ए-सफ़र
दिया
था
क्यूँँ
कार-ए-जहाँ
दराज़
है
अब
मिरा
इंतिज़ार
कर
Allama Iqbal
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मुझे
ख़ुश
करने
की
कोई
नई
तरकीब
ढूँढो
अब
यूँँ
उसका
ज़िक्र
हर
इक
बात
पर
अच्छा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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मोहब्बत
में
नहीं
है
फ़र्क़
जीने
और
मरने
का
उसी
को
देख
कर
जीते
हैं
जिस
काफ़िर
पे
दम
निकले
Mirza Ghalib
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मुमकिन
ही
नहीं
जीतना
कोशिश
से
कोई
दिल
कुछ
बस
में
नहीं
बाल
बनाने
के
अलावा
Shariq Kaifi
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वो
तो
ख़ुश-बू
है
हवाओं
में
बिखर
जाएगा
मसअला
फूल
का
है
फूल
किधर
जाएगा
Parveen Shakir
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इक
नज़र
उस
चेहरे
की
देखी
है
जब
से
यार
मुँह
उतरा
हुआ
है
रौशनी
का
Harsh saxena
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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रोज़
ये
ख़्वाब
डराता
है
मुझे
कोई
साया
लिए
जाता
है
मुझे
ये
सदा
काश
उसी
ने
दी
हो
इस
तरह
वो
ही
बुलाता
है
मुझे
मैं
खिंचा
जाता
हूँ
सहरा
की
तरफ़
यूँँ
तो
दरिया
भी
बुलाता
है
मुझे
देखना
चाहता
हूँ
गुम
हो
कर
क्या
कोई
ढूँड
के
लाता
है
मुझे
इश्क़
बीनाई
बढ़ा
देता
है
जाने
क्या
क्या
नज़र
आता
है
मुझे
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Vikas Sharma Raaz
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दिल-खंडर
में
खड़े
हुए
हैं
हम
बाज़गश्त
अपनी
सुन
रहे
हैं
हम
मुद्दतें
हो
गईं
हिसाब
किए
क्या
पता
कितने
रह
गए
हैं
हम
जब
हमें
साज़गार
है
ही
नहीं
जिस्म
को
पहने
क्यूँँ
हुए
हैं
हम
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ुबूल
होंगे
उसे
रौशनी
के
लिए
नए
हैं
हम
वहशतें
लग
गईं
ठिकाने
सब
दश्त
को
रास
आ
गए
हैं
हम
धुन
तो
आहिस्ता
बज
रही
है
'राज़'
रक़्स
कुछ
तेज़
कर
रहे
हैं
हम
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Vikas Sharma Raaz
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हवा
के
साथ
यारी
हो
गई
है
दिए
की
उम्र
लंबी
हो
गई
है
फ़क़त
ज़ंजीर
बदली
जा
रही
थी
मैं
समझा
था
रिहाई
हो
गई
है
बची
है
जो
धनक
उस
का
करूँँ
क्या
तिरी
तस्वीर
पूरी
हो
गई
है
हमारे
दरमियाँ
जो
उठ
रही
थी
वो
इक
दीवार
पूरी
हो
गई
है
क़रीब
आ
तो
गया
है
चाँद
मेरे
मगर
हर
चीज़
धुँदली
हो
गई
है
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Vikas Sharma Raaz
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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मेरी
कोशिश
तो
यही
है
कि
ये
मासूम
रहे
और
दिल
है
कि
समझदार
हुआ
जाता
है
Vikas Sharma Raaz
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