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Vikas Sharma Raaz
dasht ki KHaak bhi chaani hai
dasht ki KHaak bhi chaani hai | दश्त की ख़ाक भी छानी है
- Vikas Sharma Raaz
दश्त
की
ख़ाक
भी
छानी
है
घर
सी
कहाँ
वीरानी
है
ऐसी
प्यास
और
ऐसा
सब्र
दरिया
पानी
पानी
है
कश्ती
वाले
हैं
मायूस
घुटनों
घुटनों
पानी
है
कोई
ये
भी
सोचेगा
कैसे
आग
बुझानी
है
हम
ने
चख
कर
देख
लिया
दुनिया
खारा
पानी
है
एक
बरस
और
बीत
गया
कब
तक
ख़ाक
उड़ानी
है
- Vikas Sharma Raaz
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पेड़
के
काटने
वालों
को
ये
मालूम
तो
था
जिस्म
जल
जाएँगे
जब
सर
पे
न
साया
होगा
Kaifi Azmi
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ज़हीफ़ी
इस
लिए
मुझको
सुहानी
लग
रही
है
इसे
कमाने
में
पूरी
जवानी
लग
रही
है
नतीजा
ये
है
कि
बरसों
तलाश-ए-ज़ात
के
बाद
वहाँ
खड़ा
हूँ
जहाँ
रेत
पानी
लग
रही
है
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Khalid Sajjad
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ऐसा
बदला
हूँ
तिरे
शहर
का
पानी
पी
कर
झूट
बोलूँ
तो
नदामत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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ज़मीं
का
जल
कभी
बादल
रहा
है
तमाशा
ज़िन्दगी
का
चल
रहा
है
Umesh Maurya
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तुम्हारा
सिर्फ़
हवाओं
पे
शक
गया
होगा
चराग़
ख़ुद
भी
तो
जल
जल
के
थक
गया
होगा
Zubair Ali Tabish
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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तुमने
कैसे
उसके
जिस्म
की
ख़ुशबू
से
इनकार
किया
उस
पर
पानी
फेंक
के
देखो
कच्ची
मिट्टी
जैसा
है
Tehzeeb Hafi
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तमन्ना
है
दिवाली
में
दिया
इक
जल
उठे
ऐसा
जला
दे
फ़ासले
सारे
हमारे
दरमियाँ
जो
हैं
Bhoomi Srivastava
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बदन
के
दोनों
किनारों
से
जल
रहा
हूँ
मैं
कि
छू
रहा
हूँ
तुझे
और
पिघल
रहा
हूँ
मैं
Irfan Siddiqi
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हो
गए
राम
जो
तुम
ग़ैर
से
ए
जान-ए-जहाँ
जल
रही
है
दिल-ए-पुर-नूर
की
लंका
देखो
Kalb-E-Hussain Nadir
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एक
बरस
और
बीत
गया
कब
तक
ख़ाक
उड़ानी
है
Vikas Sharma Raaz
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सब
के
आगे
नहीं
बिखरना
है
अब
जुनूँ
और
तरह
करना
है
क्या
ज़रूरत
है
इतने
ख़्वाबों
की
दश्त-ए-शब
पार
ही
तो
करना
है
आ
गए
ज़िंदगी
के
झाँसे
में
ठान
रक्खा
था
आज
मरना
है
पूछना
चाहिए
था
दरिया
को
डूबना
है
कि
पार
उतरना
है
बैंड-बाजा
है
थोड़ी
देर
का
बस
रात
भर
किस
ने
रक़्स
करना
है
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Vikas Sharma Raaz
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दाग़
होने
लगे
ज़ाहिर
मेरे
तेज़
कर
रंग
मुसव्विर
मेरे
मेरी
आँखों
में
सियाही
भर
दे
या
हरे
कर
दे
मनाज़िर
मेरे
नुक़रई
झील
बुलाती
थी
उन्हें
फँस
गए
जाल
में
ताइर
मेरे
कौन
तहलील
हुआ
है
मुझ
में
मुंतशिर
क्यूँँ
हैं
अनासिर
मेरे
है
कहाँ
शंख
बजाने
वाला
कब
से
ख़ामोश
हैं
मंदिर
मेरे
संग
से
जिस्म
भी
कर
अब
मुझ
को
तू
कहाँ
खोया
है
साहिर
मेरे
लफ़्ज़
की
क़ैद-ओ-रिहाई
का
हुनर
काम
आ
ही
गया
आख़िर
मेरे
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Vikas Sharma Raaz
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फिर
वही
शब
वही
सितारा
है
फिर
वही
आसमाँ
हमारा
है
वो
जो
ता'मीर
थी
तुम्हारी
थी
ये
जो
मलबा
है
सब
हमारा
है
वो
जज़ीरा
ही
कुछ
कुशादा
था
हम
ने
समझा
यही
किनारा
है
चाहता
है
कि
कहकशाँ
में
रहे
मेरे
अंदर
जो
इक
सितारा
है
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Vikas Sharma Raaz
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दिल-खंडर
में
खड़े
हुए
हैं
हम
बाज़गश्त
अपनी
सुन
रहे
हैं
हम
मुद्दतें
हो
गईं
हिसाब
किए
क्या
पता
कितने
रह
गए
हैं
हम
जब
हमें
साज़गार
है
ही
नहीं
जिस्म
को
पहने
क्यूँँ
हुए
हैं
हम
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ुबूल
होंगे
उसे
रौशनी
के
लिए
नए
हैं
हम
वहशतें
लग
गईं
ठिकाने
सब
दश्त
को
रास
आ
गए
हैं
हम
धुन
तो
आहिस्ता
बज
रही
है
'राज़'
रक़्स
कुछ
तेज़
कर
रहे
हैं
हम
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Vikas Sharma Raaz
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