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Vedic Dwivedi
likhna jo hua KHud ko ik diya likhoonga main
likhna jo hua KHud ko ik diya likhoonga main | लिखना जो हुआ ख़ुद को इक दिया लिखूंगा मैं
- Vedic Dwivedi
लिखना
जो
हुआ
ख़ुद
को
इक
दिया
लिखूंगा
मैं
दिलरुबा
को
अपने
बहती
हवा
लिखूंगा
मैं
बे-चैन
हो
ख़त
पढ़
के
उसको
नींद
ना
आए
नाम
अपना
कोने
में
सर-फिरा
लिखूंगा
मैं
इश्क़
की
ग़ज़ल
मेरी
हो
गई
मुकम्मल
तो
ख़ुद
रदीफ़
बन
तुमको
क़ाफ़िया
लिखूंगा
मैं
- Vedic Dwivedi
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हवा
को
ख़रीद'ने
के
लाले
पडे
हैं
हमारे
कयामत
से
पाले
पड़े
हैं
Amol
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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बहुत
सी
कश्तियाँ
डूबी
जहाँ
पर
हवा
की
साजि़शें
गहरी
बहुत
थी
Umesh Maurya
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क्यूँ
परेशाँ
हो
अब
सवालों
पे
धूल
तो
आ
गई
है
बालों
पे
हैं
रकीबों
के
तोहफ़े
साहब
दाँतों
के
सब
निशान
गालों
पे
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A R Sahil "Aleeg"
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गुलाब
टहनी
से
टूटा
ज़मीन
पर
न
गिरा
करिश्में
तेज़
हवा
के
समझ
से
बाहर
हैं
Shahryar
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तरीक़े
और
भी
हैं
इस
तरह
परखा
नहीं
जाता
चराग़ों
को
हवा
के
सामने
रक्खा
नहीं
जाता
मोहब्बत
फ़ैसला
करती
है
पहले
चंद
लम्हों
में
जहाँ
पर
इश्क़
होता
है
वहाँ
सोचा
नहीं
जाता
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Abrar Kashif
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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क़फ़स
को
तोड़
के
जब
भी
असीर
निकलेगा
हमारे
खोल
के
अंदर
से
मीर
निकलेगा
धुआँ
है
राख
है
और
ढ़ेर
है
चिताओं
का
यहीं
से
नाचता
गाता
कबीर
निकलेगा
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Vishnu virat
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समुंदर
आँख
में
जिसके
हो
सिमटा
उसे
बारिश
ग़मों
की
क्या
भिगोएगी
Vedic Dwivedi
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लौट
भी
आए
तो
हमको
क्या
मिलेगा
इश्क़
में
फिर
से
नया
वा'दा
मिलेगा
चिट्ठियाँ
फिर
से
चलन
में
आ
गईं
जो
हीर
को
फिर
से
वही
रांझा
मिलेगा
सुब्ह
कहती
है
न
बैठो
हार
कर
तुम
था
बुरा
दिन
आज
कल
अच्छा
मिलेगा
है
बरेली
और
तुम
ये
पूछते
हो
क्या
यहाँ
पर
कान
का
झुमका
मिलेगा
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Vedic Dwivedi
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मुहब्बत
की
नहीं
जाती
ज़बरदस्ती
पुरानी
याद
से
पीछा
छुड़ाते
चल
Vedic Dwivedi
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हक़ीक़त
उन्हें
जब
बताने
लगे
सभी
लोग
उठ
करके
जाने
लगे
बसाने
में
जिसको
ज़माना
लगा
मिरा
शहर
क्यूँँं
वो
जलाने
लगे
जिसे
घर
की
लक्ष्मी
बताया
गया
निलामी
उसी
की
कराने
लगे
थी
नफ़रत
दिलों
में
हमारे
लिए
मिरे
शव
पे
आँसू
बहाने
लगे
बुरे
वक़्त
में
काम
आए
नहीं
मुझे
अपने
भी
सब
बेगाने
लगे
हवा
में
घुला
ज़ह्र
क्या
ख़ुद
से
ही
घुला
है
ये
जब
कारखाने
लगे
था
मालूम
उनको
नहीं
क्या
है
ये
थे
भूखे
जो
माहुर
भी
खाने
लगे
लगा
टूटने
हौसला
जब
कभी
अज़ल
की
ग़ज़ल
गुनगुनाने
लगे
उजाले
में
"दीपक"
की
रातें
कटी
हुई
सुब्ह
उसको
बुझाने
लगे
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Vedic Dwivedi
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उसने
ख़त
इक
रात
लिखे
थे
आँसू
से
दिल
के
सब
जज़्बात
लिखे
थे
आँसू
से
Vedic Dwivedi
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