vo KHvaab hi sahi peshe-e-nazar to ab bhi hai | वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

  - Ummeed Fazli
वोख़्वाबहीसहीपेश-ए-नज़रतोअबभीहै
बिछड़नेवालाशरीक-ए-सफ़रतोअबभीहै
ज़बाँबुरीदासहीमैंख़िज़ाँ-गज़ीदासही
हरा-भरामिराज़ख़्म-ए-हुनरतोअबभीहै
सुनाथाहमनेकिमौसमबदलगएहैंमगर
ज़मींसेफ़ासला-ए-अब्र-ए-तरतोअबभीहै
हमारीदर-बदरीपरजाइएकिहमें
शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दरतोअबभीहै
हवसकेदौरमेंमम्नून-ए-याद-ए-यारहैंहम
कियाद-ए-यारदिलोंकीसिपरतोअबभीहै
कहानियाँहैंअगरमो'तबरतोफिरइकशख़्स
कहानियोंकीतरहमो'तबरतोअबभीहै
हज़ारखींचलेसूरजहिसार-ए-अब्रमगर
किरनकिरनपेगिरफ़्त-ए-नज़रतोअबभीहै
समुंदरोंसेज़मीनोंकोख़ौफ़क्याकिउमीद
नुमू-पज़ीरज़मीन-ए-हुनरतोअबभीहै
मगरयेकौनबदलतीहुईरुतोंसेकहे
शजरमेंसायानहींहैशजरतोअबभीहै
  - Ummeed Fazli
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