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Umrez Ali Haider
ye ahl ae sukhun ka bhi padna hai mushkil men
ye ahl ae sukhun ka bhi padna hai mushkil men | ये अहल ए सुख़न का भी पड़ना है मुश्किल में
- Umrez Ali Haider
ये
अहल
ए
सुख़न
का
भी
पड़ना
है
मुश्किल
में
जो
मिल
जाए
दाद
एक
शाइर
को
महफ़िल
में
- Umrez Ali Haider
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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तेरे
होते
हुए
महफ़िल
में
जलाते
हैं
चराग़
लोग
क्या
सादा
हैं
सूरज
को
दिखाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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उसने
महफ़िल
से
उठाया
हमको
जिसको
पलकों
पे
बिठाया
हमने
Vishal Bagh
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न
जाने
कब
से
इक
मतला
लिए
बैठा
हूँ
महफ़िल
में
तुम्हारा
ज़िक्र
कर
दे
कोई
तो
पूरी
ग़ज़ल
कर
लूँ
Harsh saxena
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महीनों
तक
रहा
करते
थे
सब
मेहमान
आँखों
में,
मगर
अब
ख़्वाब
भी
आते
नहीं
वीरान
आँखों
में
ज़मान
ए
हिज्र
कहने
को
रिवाज़
ए
इश्क़
ही
तो
है,
मगर
क्या
क्या
नहीं
होता
है
इस
दौरान
आँखों
में
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Darpan
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ज़ेहन
से
यादों
के
लश्कर
जा
चुके
वो
मेरी
महफ़िल
से
उठ
कर
जा
चुके
मेरा
दिल
भी
जैसे
पाकिस्तान
है
सब
हुकूमत
करके
बाहर
जा
चुके
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Tehzeeb Hafi
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महफ़िल
में
तेरी
यूँँ
ही
रहे
जश्न-ए-चरागाँ
आँखों
में
ही
ये
रात
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
Sahir Ludhianvi
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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वो
बस्ती
न
सहरा
यहाँ
अब
दिलो-जाँ
हुए
हैं
फ़ुलाँ
अब
Umrez Ali Haider
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कहीं
से
तो
आए
मुग़ाँ
अब
दिलो-जाँ
हुए
हैं
फुलाँ
अब
न
बस्ती
न
सहरा
यहाँ
अब
मैं
जाऊँ
तो
जाऊँ
कहाँ
अब
निकलते
ही
दैरो-हरम
से
हैं
लड़ते
धरम
के
मुग़ाँ
अब
दिलों
से
निकल
के
सड़क
पर
हैं
दीनो-धरम
के
निशाँ
अब
रहे
जो
न
बस्ती
में
इंसाँ
सो
हर
सू
है
जंगल
वहाँ
अब
बनाता
हूँ
सहरा
को
बस्ती
सिवा
जो
है
वहमो-गुमाँ
अब
लगाई
है
कुर्सी
ने
जो
आग
रहा
जल
ये
हिन्दोस्ताँ
अब
है
मतलब
जहाँ
में
सिवा
जो
वफ़ा
है
न
ही
दिल-सिताँ
अब
मैं
बस्ती-ओ-सहरा
भी
देखा
कहीं
भी
न
अमनो-अमाँ
अब
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Umrez Ali Haider
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दिल
से
कुछ
तो
कहो
कि
वो
पिघले
बे-दिली
आँख-तर
नहीं
होती
Umrez Ali Haider
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कही
है
कब
ग़ज़ल
मैंने
कही
है
ज़िन्दगी
अपनी
कभी
सोचा
कहाँ
था
मैं
तुम्हारी
दाद
में
आना
Umrez Ali Haider
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बनाता
हूँ
सहरा
को
बस्ती
सिवा
जो
है
वहमो-गुमाँ
अब
Umrez Ali Haider
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