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Umrez Ali Haider
kahii se to aa.e mugaan ab
kahii se to aa.e mugaan ab | कहीं से तो आए मुग़ाँ अब
- Umrez Ali Haider
कहीं
से
तो
आए
मुग़ाँ
अब
दिलो-जाँ
हुए
हैं
फुलाँ
अब
न
बस्ती
न
सहरा
यहाँ
अब
मैं
जाऊँ
तो
जाऊँ
कहाँ
अब
निकलते
ही
दैरो-हरम
से
हैं
लड़ते
धरम
के
मुग़ाँ
अब
दिलों
से
निकल
के
सड़क
पर
हैं
दीनो-धरम
के
निशाँ
अब
रहे
जो
न
बस्ती
में
इंसाँ
सो
हर
सू
है
जंगल
वहाँ
अब
बनाता
हूँ
सहरा
को
बस्ती
सिवा
जो
है
वहमो-गुमाँ
अब
लगाई
है
कुर्सी
ने
जो
आग
रहा
जल
ये
हिन्दोस्ताँ
अब
है
मतलब
जहाँ
में
सिवा
जो
वफ़ा
है
न
ही
दिल-सिताँ
अब
मैं
बस्ती-ओ-सहरा
भी
देखा
कहीं
भी
न
अमनो-अमाँ
अब
- Umrez Ali Haider
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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रोज़
बस्ते
हैं
कई
शहर
नए
रोज़
धरती
में
समा
जाते
हैं
Kaifi Azmi
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'अल्वी'
ये
मो'जिज़ा
है
दिसम्बर
की
धूप
का
सारे
मकान
शहर
के
धोए
हुए
से
हैं
Mohammad Alvi
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लाज़िम
है
अब
कि
आप
ज़ियादा
उदास
हों
इस
शहर
में
बचे
हैं
बहुत
कम
उदास
लोग
Bhaskar Shukla
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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बस्ती
में
अपनी
हिन्दू
मुसलमाँ
जो
बस
गए
इंसाँ
की
शक्ल
देखने
को
हम
तरस
गए
Kaifi Azmi
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रोशनी
बढ़ने
लगी
है
शहर
की
चाँद
छत
पर
आ
गया
है
देखिए
Divy Kamaldhwaj
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तुम्हें
मैं
क्या
बताऊँ
इस
शहर
का
हाल
कैसा
है
यहाँ
बारिश
तो
होती
है
मगर
सावन
नहीं
आता
Bhaskar Shukla
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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हैरत
करूँँ
मैं
क्यूँ
तेरी
रविश
पे
हर
शय
में
है
झलक
नाज़-ओ-अदा
की
उजड़े
जो
मय-कदा,
मयकश
मरेंगे
मयकश
को
फ़िक्र
'हैदर'
मय-कदा
की
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Umrez Ali Haider
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ये
क्या
माजरा
है,
यहाँ
जो
निहाँ
है
ख़ुदी
को
उसी
में
अयाँ
देखता
हूँ
Umrez Ali Haider
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जब
ये
शोला-दरून
फटता
है
ज़ीस्त
फिर
क्यूँ
शरर
नहीं
होती
Umrez Ali Haider
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उसी
को
जहाँ
का
तहाँ
देखता
हूँ
सो
"हैदर"
किसी
को
कहाँ
देखता
हूँ
Umrez Ali Haider
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मैं
चिपक
भी
सकता
हूँ
तिरे
बदन
पर
मुझको
यूँँ
ही
ख़ाक-ए-राह
करने
वाले
Umrez Ali Haider
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