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ABhishek Parashar
mujhe pahle se hi sab kuchh pata hai
mujhe pahle se hi sab kuchh pata hai | मुझे पहले से ही सब कुछ पता है
- ABhishek Parashar
मुझे
पहले
से
ही
सब
कुछ
पता
है
कि
तेरे
और
उसके
बीच
क्या
है
उसे
भी
सब
ख़बर
है
प्यार
जिस
सेे
मेरे
होते
हुए
तुझको
हुआ
है
मुझे
इस
बात
की
हैरानी
क्यूँँ
हो
सभी
को
है
ख़बर
तू
बे-वफ़ा
है
जवानी
में
नहीं
मरना
मुझे
सो
मोहब्बत
से
किनारा
कर
लिया
है
मुझे
बर्बाद
करके
जो
हँसा
था
उसे
बर्बाद
होते
देखना
है
- ABhishek Parashar
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फिर
नए
साल
की
सरहद
पे
खड़े
हैं
हम
लोग
राख
हो
जाएगा
ये
साल
भी
हैरत
कैसी
Aziz Nabeel
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मुसलसल
तजरबों
का
है
नतीजा
मैं
दरया
से
किनारा
हो
गया
हूँ
Madan Mohan Danish
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ज़हर
खा
खा
कर
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
आजकल
ज़िंदगी
तुझ
सेे
किनारा
कर
रहे
हैं
आजकल
तू
बहुत
ही
दिलनशीं
है,
महजबीं
है
तू
मगर
तुझको
अपनाकर
ख़सारा
कर
रहे
हैं
आजकल
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Hameed Sarwar Bahraichi
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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वतन
की
ख़ाक
ज़रा
एड़ियाँ
रगड़ने
दे
मुझे
यक़ीन
है
पानी
यहीं
से
निकलेगा
Unknown
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कभी
तो
नस्ल-ओ-वतन-परस्ती
की
तीरगी
को
शिकस्त
होगी
कभी
तो
शाम-ए-अलम
मिटेगी
कभी
तो
सुब्ह-ए-ख़ुशी
मिलेगी
Abul mujahid zaid
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दिल
से
निकलेगी
न
मर
कर
भी
वतन
की
उल्फ़त
मेरी
मिट्टी
से
भी
ख़ुशबू-ए-वफ़ा
आएगी
Lal Chand Falak
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मज़हब
नहीं
सिखाता
आपस
में
बैर
रखना
हिन्दी
हैं
हम
वतन
है
हिन्दोस्ताँ
हमारा
Allama Iqbal
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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नहीं
मैं
रह
नहीं
सकता
यहीं
मैं
कह
नहीं
सकता
किनारा
है
तभी
हूँ
मैं
नहीं
तो
बह
नहीं
सकता
पुरानी
एक
इमारत
हूँ
कि
क्या
देखा
नहीं
मैंने
किसी
के
छोड़
जाने
से
तो
मैं
यूँँ
ढह
नहीं
सकता
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Praveen Bhardwaj
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भला
कब
तक
चलेगा
सिलसिला
ये
बेबसी
का
चलो
अब
ख़त्म
करते
हैं
ये
क़िस्सा
ज़िंदगी
का
मुझे
अब
और
तेरी
दुनिया
में
रहना
नहीं
है
ख़ुदा
रस्ता
दिखा
दे
अब
मुझे
तू
ख़ुद-कुशी
का
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ABhishek Parashar
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ज़िंदगी
से
चली
गई
लेकिन
वो
मेरे
ज़ेहन
से
नहीं
जाती
ABhishek Parashar
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मुझे
फिर
से
मोहब्बत
करनी
है
यारों
मुझे
फिर
से
किसी
का
दिल
चुराना
है
ABhishek Parashar
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चार
दिन
की
तो
हमारी
ज़िंदगी
है
चार
दिन
में
कैसे
सब
हासिल
करें
ABhishek Parashar
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दिन
में
वो
तारे
दिखाए
जाती
है
तीर
लफ़्ज़ों
के
चलाए
जाती
है
कैसे
अंदाज़ा
हो
उसके
ग़म
का
दोस्त
वो
जो
इतना
मुस्कुराए
जाती
है
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ABhishek Parashar
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