hayaat-o-maut ki uljhan men daalta kyuuñ hai | हयात-ओ-मौत की उलझन में डालता क्यूँ है

  - Tahir Tilhari
हयात-ओ-मौतकीउलझनमेंडालताक्यूँहै
येतोहमतेंमिरेऊपरउछालताक्यूँहै
अबगयाहूँतोख़तरेमेंडालताक्यूँहै
अँधेरीरातमेंघरसेनिकालताक्यूँहै
अभीमोआ'मला-ए-काएनाततयकरदे
ज़रासीबातक़यामतपेटालताक्यूँहै
किसीतरहभीतोइंसाँतिराहरीफ़नहीं
फिरइसग़रीबकोतूमारडालताक्यूँहै
नदीमतेरातोइसमेंकोईमफ़ादनहीं
मैंगिररहाहूँतूमुझकोसँभालताक्यूँहै
मुझेबचासकेगातूग़र्क़होनेसे
फ़ुज़ूलख़ुदकोहलाकतमेंडालताक्यूँहै
किसीतरहतोयेएहसासकाअज़ाबमिटे
तूमेरेसीनेसेख़ंजरनिकालताक्यूँहै
तूअपनीफ़िक्रकोकुछभीसमझमगर'ताहिर'
किसीकेशे'रमेंकीड़ेनिकालताक्यूँहै
  - Tahir Tilhari
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