shahar ko chot pe rakhti hai gajr men koi cheez | शहर को चोट पे रखती है गजर में कोई चीज़

  - Tafzeel Ahmad
शहरकोचोटपेरखतीहैगजरमेंकोईचीज़
बिल्लियाँढूँढतीरहतीहैंखंडरमेंकोईचीज़
चाकहैंज़ख़्मकेपानीमेंहवामेंनासूर
मुट्ठियाँतोलकेनिकलीहैसफ़रमेंकोईचीज़
बारहाआँखेंघनीकरताहूँउसपेफिरभी
छूटरहतीहैनिगहसेगुल-ए-तरमेंकोईचीज़
कभीबैठकसेरसोईकभीदालानसेछत
बावलीफिरतीहैतुझबिनमिरेघरमेंकोईचीज़
ज़िंदगीआगपेलेटीहुईपरछाईंहैक्या
बसधुआँदेतीहैहरवक़्तजिगरमेंकोईचीज़
शहर-ए-सानीमेंशजर-कारीकीदानिस्ता
फिरनिकलआएकहींबर्ग-ओ-समरमेंकोईचीज़
हश्रतकजीतीरहेंगीमिरीग़ज़लेंतफ़ज़ील
ऑक्सीजनसीलबालबहैहुनरमेंकोईचीज़
  - Tafzeel Ahmad
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