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Surendra Karkash
shayari se inqilaab aa.e to kaise
shayari se inqilaab aa.e to kaise | शा'इरी से इंक़िलाब आए तो कैसे
- Surendra Karkash
शा'इरी
से
इंक़िलाब
आए
तो
कैसे
सुन
के
सब
ताली
बजाने
में
लगे
हैं
शे'र
‘कर्कश’
कौन
महफ़िल
में
सुनेगा
लोग
सारे
नाच
गाने
में
लगे
हैं
- Surendra Karkash
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लहू
वतन
के
शहीदों
का
रंग
लाया
है
उछल
रहा
है
ज़माने
में
नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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हर
गाम
तेरे
इश्क़
का
इकरार
है
मैं
हूँ
ज़ंजीर
है
ज़ंजीर
की
झनकार
है
मैं
हूँ
ऐ
ज़ीस्त
जो
सब
सेे
बड़ी
फ़नकार
है
तू
है
और
तुझ
सेे
बड़ा
वो
जो
अदाकार
है
मैं
हूँ
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Obaid Azam Azmi
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देख
रफ़्तार-ए-इंक़लाब
'फ़िराक़'
कितनी
आहिस्ता
और
कितनी
तेज़
Firaq Gorakhpuri
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मुझको
भी
ज़िद
करने
का
हक़
दो
साहब
मेरे
भीतर
भी
इक
बच्चा
रहता
है
Atul K Rai
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देख
ज़िंदाँ
से
परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स
करना
है
तो
फिर
पाँव
की
ज़ंजीर
न
देख
Majrooh Sultanpuri
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उस
मुल्क
की
सरहद
को
कोई
छू
नहीं
सकता
जिस
मुल्क
की
सरहद
की
निगहबान
हैं
आँखें
Unknown
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ख़्वाबों
की
ता'बीर
बनी
है
इक
लड़की
मेरे
मन
की
हीर
बनी
है
इक
लड़की
दुनिया
तुझ
को
कब
का
छोड़
चुके
होते
पैरों
की
ज़ंजीर
बनी
है
इक
लड़की
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Vikas Sahaj
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दौर
ये
पहली
नज़र
के
प्यार
का
है
सब
यहाँ
चेहरा
सजाने
में
लगे
हैं
बाँटता
हैं
ग़म
यहाँ
पे
कौन
किसका
यार
बस
दारू
पिलाने
में
लगे
हैं
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Surendra Karkash
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ये
दवा
आज
आज़माने
दे
जाम
ला
उसकी
याद
आने
दे
अंजुमन
में
तिरी
सभी
दाना
इक
मुझे
भी
ग़ज़ल
सुनाने
दे
काम
उसका
चलो
करें
आसाँ
जा
रहा
है
ख़ुशी
से
जाने
दे
बात
बुत
से
ग़ज़ल
नहीं
होती
क़ाफ़िया
भी
ज़रा
मिलाने
दे
होश
वाले
अलग
नशे
में
हैं
दोस्त
मय
पीने
दे
पिलाने
दे
दिन
है
मसरूफ़
और
शब
तन्हा
शाम
तो
ख़ुशनुमा
बनाने
दे
रोज़
की
बात
है
ग़म-ए-दुनिया
छोड़
भी
गीत
गुनगुनाने
दे
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Surendra Karkash
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डिस्को
पसंद
सबको
तो
शेर-ओ-सुखन
हमें
अब
महफ़िलों
में
अपनी
वो
जादूगरी
गई
हैं
फैज़
ग़म
जवानी
में
जुज़
इश्क़
और
भी
या
नौकरी
मिली
नहीं
या
नौकरी
गई
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Surendra Karkash
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