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Sohil Barelvi
zara khaamosh ho ja ai samandar
zara khaamosh ho ja ai samandar | ज़रा ख़ामोश हो जा ऐ समुंदर
- Sohil Barelvi
ज़रा
ख़ामोश
हो
जा
ऐ
समुंदर
बहुत
हस्सास
हूँ
मैं
आज
सच-मुच
- Sohil Barelvi
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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घर
की
तक़सीम
में
अँगनाई
गँवा
बैठे
हैं
फूल
गुलशन
से
शनासाई
गँवा
बैठे
हैं
बात
आँखों
से
समझ
लेने
का
दावा
मत
कर
हम
इसी
शौक़
में
बीनाई
गँवा
बैठे
हैं
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Abrar Kashif
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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गुलशन
से
कोई
फूल
मुयस्सर
न
जब
हुआ
तितली
ने
राखी
बाँध
दी
काँटे
की
नोक
पर
Unknown
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फूल
ही
फूल
याद
आते
हैं
आप
जब
जब
भी
मुस्कुराते
हैं
Sajid Premi
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दिल
की
चोटों
ने
कभी
चैन
से
रहने
न
दिया
जब
चली
सर्द
हवा
मैं
ने
तुझे
याद
किया
Josh Malihabadi
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हमेशा
हाथों
में
होते
हैं
फूल
उनके
लिए
किसी
को
भेज
के
मँगवाने
थोड़ी
होते
हैं
Anwar Shaoor
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हज़ारों
साल
नर्गिस
अपनी
बे-नूरी
पे
रोती
है
बड़ी
मुश्किल
से
होता
है
चमन
में
दीदा-वर
पैदा
Allama Iqbal
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अश्क
कम
हों
तो
लहू
अपनी
रवानी
लेगा
मैं
किसी
शे'र
को
बे-जान
न
होने
दूँगा
Sohil Barelvi
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मुझे
इस
बात
का
डर
खा
रहा
है
कोई
सच
मुच
बदलता
जा
रहा
है
मैं
सच
का
सामना
करने
लगा
हूँ
मुझे
भी
आइना
अब
भा
रहा
है
मुझे
भी
जानना
है
जल्द
ही
अब
तू
इतना
क्यूँँ
बदलता
जा
रहा
है
मैं
सब
से
हट
के
चलना
चाहता
हूँ
कोई
मेरी
तरफ़
क्यूँँ
आ
रहा
है
तिरे
दीदार
में
कैसी
कशिश
थी
मिरा
चेहरा
दमकता
जा
रहा
है
कोई
अंदर
ही
अंदर
रोने
वाला
मेरी
लिक्खी
ग़ज़ल
को
गा
रहा
है
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Sohil Barelvi
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कोई
शायद
मिरा
यक़ीन
करे
रात
दिन
की
तरह
गुज़रती
है
Sohil Barelvi
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प्यार
में
हर
ख़त
यूँँ
लगता
है
पहले
प्यार
का
पहला
ख़त
है
Sohil Barelvi
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उदासी
ने
कभी
तन्हा
मुझे
छोड़ा
नहीं
है
इसी
बाइस
ख़ुशी
से
आज
तक
रिश्ता
नहीं
है
मेरा
इक
दोस्त
अपना
है
फ़क़त
इतना
समझ
लो
सिवा
उस
के
कोई
दिल
के
क़रीब
अपना
नहीं
है
मेरा
चेहरा
तबस्सुम
से
ढका
देखा
सभी
ने
सितारा-साज़
पलकों
तक
कोई
पहुँचा
नहीं
है
जुनूँ
है
शर्त
मंज़िल
इश्क़
की
गर
चाहते
हो
कोई
फ़हम-ओ-फ़रासत
से
यहाँ
पहुँचा
नहीं
है
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Sohil Barelvi
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