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Sohil Barelvi
meri manzil ka raasta mujh ko
meri manzil ka raasta mujh ko | मेरी मंज़िल का रास्ता मुझ को
- Sohil Barelvi
मेरी
मंज़िल
का
रास्ता
मुझ
को
एक
पंछी
दिखा
रहा
मुझ
को
उस
नगर
से
किया
जुदा
मुझ
को
कोई
अपना
नहीं
रहा
मुझ
को
तेरे
पहलू
से
ख़ूब
भटकाया
मेरी
किस्मत
ने
जा-ब-जा
मुझ
को
हादसा
ये
भी
कुछ
जुदा
सा
है
बुझता
दीपक
जला
रहा
मुझ
को
एक
रिश्ता
तबाह
कर
डाला
शक
की
दीमक
ने
खा
लिया
मुझ
को
बाद
जाने
के
आप
के
मिलता
हू-ब-हू
कोई
आप
सा
मुझ
को
हाए
पहचानता
नहीं
सोहिल
अब
तो
घर
का
भी
आइना
मुझ
को
- Sohil Barelvi
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तलाश
हम
को
किसी
भी
बदन
की
है
ही
नहीं
हवस
की
भूख
हमारे
ज़ेहन
की
है
ही
नहीं
किसी
से
बिछड़े
तो
कोई
फ़ना
नहीं
होता
क़ज़ा
की
बात
तो
अब
के
ज़मन
की
है
ही
नहीं
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Shadab Asghar
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दु'आ
में
माँग
लूँ
मैं
उसको
लेकिन
फ़क़त
पाना
मेरा
मक़सद
नहीं
है
Shadab Asghar
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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चले
चलिए
कि
चलना
ही
दलील-ए-कामरानी
है
जो
थक
कर
बैठ
जाते
हैं
वो
मंज़िल
पा
नहीं
सकते
Hafeez Banarasi
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ज़िंदगी
फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता
को
पा
सकती
नहीं
मौत
ही
आती
है
ये
मंज़िल
दिखाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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अपनी
मंज़िल
पे
पहुँचना
भी
खड़े
रहना
भी
कितना
मुश्किल
है
बड़े
हो
के
बड़े
रहना
भी
Shakeel Azmi
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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कटते
भी
चलो,
बढ़ते
भी
चलो,
बाज़ू
भी
बहुत
हैं,
सर
भी
बहुत
चलते
भी
चलो
कि
अब
डेरे
मंज़िल
ही
पे
डाले
जाएँगे
Faiz Ahmad Faiz
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न
उस
के
साथ
में
हूँ
चैन
से
मैं
न
उस
के
बिन
गुज़ारा
हो
रहा
है
Sohil Barelvi
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ऐसे
भी
लोग
हैं
जो
मुझे
दौर-ए-आज
में
सच
का
दिलासा
दे
गए
पर
सच
नहीं
कहा
Sohil Barelvi
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देखा
नहीं
बहार
ने
फिर
लौट
कर
कभी
कितने
दरख़्त
सूख
के
बे-जान
हो
गए
मुद्दत
से
जिस
दरख़्त
की
मैं
ने
की
देखभाल
उस
पर
समर
भी
आए
तो
अग़्यार
ले
गए
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Sohil Barelvi
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देख
कर
रोज़
बाहरी
मंज़र
अपनी
खिड़की
से
मुस्कुराता
हूँ
Sohil Barelvi
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तिरे
ग़म
का
यूँँ
मैं
ने
मान
रक्खा
तिरे
ग़म
में
रहा
पर
ख़ुश
रहा
मैं
Sohil Barelvi
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