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Sohil Barelvi
dekha nahin bahaar ne phir laut kar kabhi
dekha nahin bahaar ne phir laut kar kabhi | देखा नहीं बहार ने फिर लौट कर कभी
- Sohil Barelvi
देखा
नहीं
बहार
ने
फिर
लौट
कर
कभी
कितने
दरख़्त
सूख
के
बे-जान
हो
गए
मुद्दत
से
जिस
दरख़्त
की
मैं
ने
की
देखभाल
उस
पर
समर
भी
आए
तो
अग़्यार
ले
गए
- Sohil Barelvi
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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मैंने
चाहा
भी
कि
फिर
इस
संग-दिल
पे
फूल
उगे
पर
तुम्हारी
रुख़्सती
के
बाद
ये
होता
नहीं
Siddharth Saaz
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तेरे
एहसास
को
ख़ुशबू
बनाते
जो
बस
चलता
तुझे
उर्दू
बनाते
यक़ीनन
इस
से
तो
बेहतर
ही
होती
वो
इक
दुनिया
जो
मैं
और
तू
बनाते
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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चूमा
था
एक
दिन
किसी
गुल
की
जबीन
को
लहजे
से
आज
तक
मेरे
ख़ुश्बू
नहीं
गई
Afzal Ali Afzal
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छुआ
है
तुमने
भी
इक
रोज़
हमको
ये
ख़ुशबू
देर
तक
महका
करेगी
तुम्हारे
हाथ
सालों
तक
ये
दुनिया
हमारे
नाम
पे
चूमा
करेगी
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Ritesh Rajwada
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उसी
मक़ाम
पे
कल
मुझ
को
देख
कर
तन्हा
बहुत
उदास
हुए
फूल
बेचने
वाले
Jamal Ehsani
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मैं
बाग़
में
जिस
जगह
खड़ा
हूँ
हर
फूल
से
काम
चल
रहा
है
Shaheen Abbas
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तुम्हारे
बाद
के
बोसों
में
जानाँ
तुम्हारी
सांस
की
ख़ुशबू
नहीं
थी
Vikas Rana
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हर
ख़ुशी
मुस्कुरा
के
कहती
है
दर्द
बनकर
छुपे
हुए
हो
तुम
आज
आब-ओ-हवा
में
ख़ुश्बू
है
लग
रहा
है
घुले
हुए
हो
तुम
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Ritesh Rajwada
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न
उन
लबों
पे
तबस्सुम
न
फूल
शाख़ों
पर
गुज़र
गए
हैं
जो
मौसम
गुज़रने
वाले
थे
Kaif Uddin Khan
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जो
वादे
किए
हैं
निभाते
रहेंगे
मोहब्बत
की
लौ
को
बढ़ाते
रहेंगे
तू
चाहे
न
चाहे
मगर
हम
मुसलसल
तुझे
याद
आए
हैं
आते
रहेंगे
चलो
कितनी
चालें
चलोगे
रक़ीबों
तुम्हें
आइना
हम
दिखाते
रहेंगे
कोई
तो
ज़माने
में
होगा
हमारा
जिसे
दर्द
दिल
का
सुनाते
रहेंगे
नहीं
होगा
तू
तो
ये
तस्वीर
तेरी
कलेजे
से
अपने
लगाते
रहेंगे
मोहब्बत
के
मज़दूर
हैं
हम
तो
सोहिल
कमाते
रहे
हैं
कमाते
रहेंगे
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Sohil Barelvi
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वाक़िफ़
उस
से
रस्ता
होगा
रस्ते
भर
जो
भटका
होगा
पहले
नाव
भँवर
तक
जाए
फिर
मल्लाह
से
झगड़ा
होगा
सर
को
था
में
बैठा
है
जो
उस
के
सर
पे
बोझा
होगा
बीनाई
जो
खो
बैठा
है
उस
ने
सब
कुछ
देखा
होगा
छोटी
बातें
भूल
गए
गर
और
ख़सारा
ज़्यादा
होगा
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Sohil Barelvi
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आँख
भूली
है
बाप
की
सूरत
उस
पे
दुख
हैं
शराप
की
सूरत
ग़म-ज़दा
इक
ग़ज़ल
पढ़ी
अपनी
दर्द
उभरे
अलाप
की
सूरत
याद
माँ
की
रुला
गई
मुझ
को
मैं
ने
देखी
थी
बाप
की
सूरत
ताल
तन्हाई
देती
रहती
है
दर्द
उठता
है
थाप
की
सूरत
कोई
ऐसा
नहीं
रहा
सोहिल
जिस
से
मिलती
हो
आप
की
सूरत
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Sohil Barelvi
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पाँव
थोड़े
पसार
लेता
हूँ
अपनी
चादर
सँवार
लेता
हूँ
जब
भी
अल्बम
निहार
लेता
हूँ
अपना
चेहरा
उतार
लेता
हूँ
कोई
बोले
तो
मेरे
दुश्मन
से
अपने
सीने
पे
वार
लेता
हूँ
कान
कच्चे
हैं
ग़म-गुसारों
के
फिर
मैं
ख़ुद
को
पुकार
लेता
हूँ
रास
आया
नहीं
जहाँ
फिर
भी
एक
दो
दिन
गुज़ार
लेता
हूँ
पेट
भरता
हूँ
एक
शाइर
का
अपने
हक़
को
मैं
मार
लेता
हूँ
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Sohil Barelvi
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हम
ने
इलाज-ए-ज़ख़्म
की
हसरत
में
ऐ
हबीब
ज़ख़्मों
को
नोच
नोच
के
नासूर
कर
लिया
Sohil Barelvi
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