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Simar Gozra
rakh liya jaa.e ya fana kiya jaa.e
rakh liya jaa.e ya fana kiya jaa.e | रख लिया जाए या फ़ना किया जाए
- Simar Gozra
रख
लिया
जाए
या
फ़ना
किया
जाए
इस
तबीयत
का
बोलो
क्या
किया
जाए
- Simar Gozra
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ज़िंदगी
भी
बची
कुछ
नहीं
और
हुआ
भी
अभी
कुछ
नहीं
सोचूँ
तो
उम्र
भी
कम
है
अब
देखूँ
तो
शा'इरी
कुछ
नहीं
प्यास
इक
घूँट
की
मार
है
पी
लूँ
तो
बाल्टी
कुछ
नहीं
हाल
पे
मेरे
यूँँ
हँसती
है
जैसे
वो
जानती
कुछ
नहीं
रोज़
इक
हुस्न
पर
मरना
है
और
तो
आशिक़ी
कुछ
नहीं
चीखने
को
मैं
भी
चीख
लूँ
ऐसे
तो
गायकी
कुछ
नहीं
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Simar Gozra
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ज़ख़्म
आया
है
तो
यक़ीनन
ही
मरहम-ए-इंदिमाल
भी
होगा
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बात
जब
उस
पेड़
से
होने
लगी
सुनके
उसके
पत्ते
भी
झड़ने
लगे
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अब
मेरे
पास
कुछ
भी
मेरा
नहीं
जाँ
थी
इक
वो
भी
ले
गया
कोई
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दर्द
से
दिल
लगा
रहा
हूँ
मैं
ज़ख़्म
की
ओर
जा
रहा
हूँ
मैं
देखो
रौनक़
ये
मेरे
चेहरे
पर
उसके
कूचे
से
आ
रहा
हूँ
मैं
दिल
में
जिनके
लिए
थी
वहशत
अब
गले
उनको
लगा
रहा
हूँ
मैं
ज़िंदा
इक
शख़्स
मर
गया
मुझ
में
ख़ुद
को
ख़ुद
याद
आ
रहा
हूँ
मैं
दिल
में
आँखों
में
क़दमों
में
उसके
बे-सबब
हर
जगह
रहा
हूँ
मैं
हँसता
रहता
हूँ
आज
कल
जो
अब
कुछ
न
कुछ
तो
छुपा
रहा
हूँ
मैं
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Simar Gozra
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