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Simar Gozra
ab mere paas kuchh bhi meraa nahin
ab mere paas kuchh bhi meraa nahin | अब मेरे पास कुछ भी मेरा नहीं
- Simar Gozra
अब
मेरे
पास
कुछ
भी
मेरा
नहीं
जाँ
थी
इक
वो
भी
ले
गया
कोई
- Simar Gozra
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कोई
अपना
ही
था
मेरा
शायद
दे
गया
होगा
बददुआ
शायद
अब
मुझे
जाने
दो
कि
मेरा
वक़्त
वक़्त
से
पहले
आ
गया
शायद
एक
बच्चा
जो
घर
के
झगड़ों
में
मेरे
अंदर
ही
मर
गया
शायद
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Simar Gozra
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ज़िंदगी
भी
बची
कुछ
नहीं
और
हुआ
भी
अभी
कुछ
नहीं
सोचूँ
तो
उम्र
भी
कम
है
अब
देखूँ
तो
शा'इरी
कुछ
नहीं
प्यास
इक
घूँट
की
मार
है
पी
लूँ
तो
बाल्टी
कुछ
नहीं
हाल
पे
मेरे
यूँँ
हँसती
है
जैसे
वो
जानती
कुछ
नहीं
रोज़
इक
हुस्न
पर
मरना
है
और
तो
आशिक़ी
कुछ
नहीं
चीखने
को
मैं
भी
चीख
लूँ
ऐसे
तो
गायकी
कुछ
नहीं
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Simar Gozra
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उसको
कहना
कि
मुहब्बत
न
करे
गर
करे
तो
वो
शिकायत
न
करे
वस्ल
उस
शख़्स
से
हो
मेरा
जो
मरने
के
बाद
भी
हिजरत
न
करे
उसके
ही
शहर
के
शाइर
थे
सब
उसकी
फिर
कैसे
रिवायत
न
करे
ऐब
जब
उसके
गिनाने
मैं
लगूँ
फिर
कोई
उसकी
हिमायत
न
करे
टूटे
हैं
सारे
त'अल्लुक़
तो
अब
यार
वो
हम
से
अदावत
न
करे
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Simar Gozra
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लोग
तो
इसको
धोखा
जुदाई
दर्द
फ़िराक़त
मानते
हैं
बस
हम
शाइर
ही
है
मुहब्बत
को
जो
मुहब्बत
मानते
हैं
Simar Gozra
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उसके
शहर
के
लड़के
होंगे
मरते
होंगे
वो
जो
उस
पे
मरते
होंगे
मरते
होंगे
ख़ल्वत
कैसे
ज़िंदगी
को
खा
जाती
है
दोस्त
इश्क़
से
जो
भी
डरते
होंगे
मरते
होंगे
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Simar Gozra
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