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Simar Gozra
log to isko dhokha judaai dard firaaqat maante hain
log to isko dhokha judaai dard firaaqat maante hain | लोग तो इसको धोखा जुदाई दर्द फ़िराक़त मानते हैं
- Simar Gozra
लोग
तो
इसको
धोखा
जुदाई
दर्द
फ़िराक़त
मानते
हैं
बस
हम
शाइर
ही
है
मुहब्बत
को
जो
मुहब्बत
मानते
हैं
- Simar Gozra
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मैं
नहीं
चाहता
वो
मुझको
इज़हार
करे
गर
मैं
करूँॅं
तो
फिर
वो
क्यूँँॅं
इनकार
करे
उसको
चाहने
वालों
मुझ
सेे
पूछो
तुम
वो
मर
जाए
जो
भी
उस
सेे
प्यार
करे
सुना
कि
वो
गुज़रे
तो
बारिश
होती
है
ऐसा
है
तो
सहरा
में
बौछार
करे
चाहत
रखने
से
नई
लैला
मिल
जाती
कोई
मजनू
के
जैसा
भी
प्यार
करे
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हम
वो
दौलत
जो
कासे
में
नहीं
आते
ये
किरदार
इतने
सस्ते
में
नहीं
आते
हुस्न
कभी
हमको
क़ैदी
नहीं
कर
सकता
हम
वो
परिंदे
जो
पिंजरे
में
नहीं
आते
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मरे
पड़े
थे
वैसे
भी
हालात
से
हम
तुमको
भी
तो
खो
बैठे
थे
हाथ
से
हम
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सुना
कि
वो
गुज़रे
तो
बारिश
होती
है
ऐसा
है
तो
सहरा
में
बौछार
करे
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पुर-सुकूँ
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
जो
बशर
बे-ख़ुदी
को
भूल
गया
प्यास
के
चलते
मरने
वाला
था
प्यास
बुझते
नदी
को
भूल
गया
घर
में
तब
घर
किया
अंधेरे
ने
जब
दिया
रौशनी
को
भूल
गया
जो
खड़ा
साथ
वक़्त-ए-उलझन
में
वक़्त
सुलझा
उसी
को
भूल
गया
क्या
है
मानी
सफ़र
का
जब
राही
मंज़िल-ए-आख़िरी
को
भूल
गया
ज़ोर
और
ज़ुल्म
में
फॅंसा
बंदा
तेरी
मौजूदगी
को
भूल
गया
नक़्ल-ए-दुनिया
में
मुब्तिला
इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी
को
भूल
गया
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Simar Gozra
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