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Simar Gozra
jaise KHud hi ped giraa ho aare par
jaise KHud hi ped giraa ho aare par | जैसे ख़ुद ही पेड़ गिरा हो आरे पर
- Simar Gozra
जैसे
ख़ुद
ही
पेड़
गिरा
हो
आरे
पर
हम
सेे
क़ाबू
हुआ
न
अपने
ग़ुस्से
पर
मैं
हूँ
जो
हूँ
ख़ाली
पड़ा
हूँ
कमरे
में
बर्तन
हैं
जो
ख़ाली
पड़े
हैं
चूल्हे
पर
- Simar Gozra
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सोचता
हूँ
तेरा
क्या
लगता
हूँ
दर्द
या
फिर
मैं
दवा
लगता
हूँ
उसने
पूछा
तो
बता
देता
ना
रिश्ते
में
मैं
तेरा
क्या
लगता
हूँ
सारी
दुनिया
है
परेशाँ
मुझ
सेे
क्या
मैं
तुझको
भी
बुरा
लगता
हूँ
अब
तो
आँखें
भी
न
ख़ुद
से
मिलती
मैं
तो
ख़ुद
से
भी
ख़फ़ा
लगता
हूँ
क्यूँ
दिखाते
हो
ये
शीशा
मुझको
मुँह
पे
बोलो
मैं
बुरा
लगता
हूँ
मेरी
ख़ल्वत
भी
ख़ला
है
जो
अब
मैं
तो
ख़ुद
से
भी
जुदा
लगता
हूँ
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Simar Gozra
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हर
इक
साँस
कि
जैसे
कोई
मिस्रा
हो
ज़िन्दगी
भी
शा'इरी
के
जैसी
काटी
है
शौक़
तो
शायर
बनने
का
था
मुझको
पर
ये
मत
पूछो
नौकरी
कैसी
काटी
है
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पुर-सुकूँ
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
जो
बशर
बे-ख़ुदी
को
भूल
गया
प्यास
के
चलते
मरने
वाला
था
प्यास
बुझते
नदी
को
भूल
गया
घर
में
तब
घर
किया
अंधेरे
ने
जब
दिया
रौशनी
को
भूल
गया
जो
खड़ा
साथ
वक़्त-ए-उलझन
में
वक़्त
सुलझा
उसी
को
भूल
गया
क्या
है
मानी
सफ़र
का
जब
राही
मंज़िल-ए-आख़िरी
को
भूल
गया
ज़ोर
और
ज़ुल्म
में
फॅंसा
बंदा
तेरी
मौजूदगी
को
भूल
गया
नक़्ल-ए-दुनिया
में
मुब्तिला
इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी
को
भूल
गया
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Simar Gozra
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रख
लिया
जाए
या
फ़ना
किया
जाए
इस
तबीअत
का
बोलो
क्या
किया
जाए
इश्क़
करना
अगर
बुरा
है
तो
फिर
अब
मेरे
साथ
भी
बुरा
किया
जाए
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वही
तो
दिन
था
जब
था
छोड़ा
उसने
फिर
मनाया
तब
से
मैंने
जन्मदिन
नहीं
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