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Simar Gozra
har ik saans ki jaise koii misra ho
har ik saans ki jaise koii misra ho | हर इक साँस कि जैसे कोई मिस्रा हो
- Simar Gozra
हर
इक
साँस
कि
जैसे
कोई
मिस्रा
हो
ज़िन्दगी
भी
शा'इरी
के
जैसी
काटी
है
शौक़
तो
शायर
बनने
का
था
मुझको
पर
ये
मत
पूछो
नौकरी
कैसी
काटी
है
- Simar Gozra
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पुर-सुकूँ
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
जो
बशर
बे-ख़ुदी
को
भूल
गया
प्यास
के
चलते
मरने
वाला
था
प्यास
बुझते
नदी
को
भूल
गया
घर
में
तब
घर
किया
अंधेरे
ने
जब
दिया
रौशनी
को
भूल
गया
जो
खड़ा
साथ
वक़्त-ए-उलझन
में
वक़्त
सुलझा
उसी
को
भूल
गया
क्या
है
मानी
सफ़र
का
जब
राही
मंज़िल-ए-आख़िरी
को
भूल
गया
ज़ोर
और
ज़ुल्म
में
फॅंसा
बंदा
तेरी
मौजूदगी
को
भूल
गया
नक़्ल-ए-दुनिया
में
मुब्तिला
इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी
को
भूल
गया
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Simar Gozra
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हम
भी
अपने
घर
के
चराग़
रौशन
करते
परिंदों
को
घर
देते
कि
बाग़
रौशन
करते
Simar Gozra
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दिल
में
मेरे
ये
डर
सा
उठा
है
वो
मेरे
शहर
में
आ
चुका
है
मुझको
कोई
तो
घर
छोड़
आओ
जिसको
भी
मेरे
घर
का
पता
है
मैं
उसे
अब
कहा
ढूँढूँ
जो
वो
मेरे
भीतर
कहीं
तो
छुपा
है
अब
फ़क़त
राख
होना
है
बाक़ी
आग
तो
वो
लगा
ही
चुका
है
कौन
से
मुँह
उसे
मिलने
जाऊँ
उसके
घर
आगे
शीशा
लगा
है
हम
कहा
थे
कहाँ
आ
चुके
हैं
वो
कहाँ
था
कहाँ
जा
चुका
है
दूर
से
तुम
नहीं
दिख
रहे
और
वैसे
भी
मुझको
चश्मा
लगा
है
किसको
किसको
मनाऊँ
मैं
जो
अब
हर
कोई
मुझ
सेे
यूँँ
ही
ख़फ़ा
है
सारे
'आशिक़
यहाँ
मरते
हैं
वो
उसका
दिल
ऐसा
दश्त-ए-वगा
है
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Simar Gozra
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साथ
नहीं
है
इसीलिए
हम
होश
में
हैं
वो
साथ
होता
तो
हम
हैरत
में
होते
Simar Gozra
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हम
वो
दौलत
जो
कासे
में
नहीं
आते
ये
किरदार
इतने
सस्ते
में
नहीं
आते
हुस्न
कभी
हमको
क़ैदी
नहीं
कर
सकता
हम
वो
परिंदे
जो
पिंजरे
में
नहीं
आते
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Simar Gozra
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