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Simar Gozra
apna sa hai ye lag raha koii
apna sa hai ye lag raha koii | अपना सा है ये लग रहा कोई
- Simar Gozra
अपना
सा
है
ये
लग
रहा
कोई
मेरी
आँखों
में
हादसा
कोई
अब
मेरे
पास
मेरा
कुछ
भी
नहीं
जाँ
थी
इक
वो
भी
ले
गया
कोई
देख
ये
ज़ख़्मों
से
भरे
हुए
हाथ
कभी
इनको
था
चूमता
कोई
सज़ा
भी
हमको
रात
की
ही
हुई
चैन
से
कैसे
काटता
कोई
कही
रख
कर
मैं
ख़ुद
को
भूल
गया
मुझको
फिर
कैसे
ढूँढता
कोई
- Simar Gozra
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जब
मस्तक
पर
ही
लिख
दी
थी
अँधेरे
की
लौ
तो
फिर
हम
क्या
उसका
सुहाग
रौशन
करते
Simar Gozra
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मरे
पड़े
थे
वैसे
भी
हालात
से
हम
तुमको
भी
तो
खो
बैठे
थे
हाथ
से
हम
Simar Gozra
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पुर-सुकूँ
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
जो
बशर
बे-ख़ुदी
को
भूल
गया
प्यास
के
चलते
मरने
वाला
था
प्यास
बुझते
नदी
को
भूल
गया
घर
में
तब
घर
किया
अंधेरे
ने
जब
दिया
रौशनी
को
भूल
गया
जो
खड़ा
साथ
वक़्त-ए-उलझन
में
वक़्त
सुलझा
उसी
को
भूल
गया
क्या
है
मानी
सफ़र
का
जब
राही
मंज़िल-ए-आख़िरी
को
भूल
गया
ज़ोर
और
ज़ुल्म
में
फॅंसा
बंदा
तेरी
मौजूदगी
को
भूल
गया
नक़्ल-ए-दुनिया
में
मुब्तिला
इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी
को
भूल
गया
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ज़िंदगी
भी
बची
कुछ
नहीं
और
हुआ
भी
अभी
कुछ
नहीं
सोचूँ
तो
उम्र
भी
कम
है
अब
देखूँ
तो
शा'इरी
कुछ
नहीं
प्यास
इक
घूँट
की
मार
है
पी
लूँ
तो
बाल्टी
कुछ
नहीं
हाल
पे
मेरे
यूँँ
हँसती
है
जैसे
वो
जानती
कुछ
नहीं
रोज़
इक
हुस्न
पर
मरना
है
और
तो
आशिक़ी
कुछ
नहीं
चीखने
को
मैं
भी
चीख
लूँ
ऐसे
तो
गायकी
कुछ
नहीं
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Simar Gozra
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जो
अपने
हालात
से
मारा
होता
है
उस
बंदे
का
ख़ुदा
सहारा
होता
है
जिस
कश्ती
की
पाल
ही
टूटी
फूटी
हो
उस
कश्ती
का
कौन
किनारा
होता
है
मुझ
सेे
बिछड़ोगे
तो
मैं
ये
देखूँगा
मेरे
बाद
भी
कौन
तुम्हारा
होता
है
उसकी
इक
तस्वीर
पड़ी
है
बटुए
में
जिसको
देख
के
मेरा
गुज़ारा
होता
है
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Simar Gozra
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