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Simar Gozra
jab mastak par hi likh dii thii andhere kii lau
jab mastak par hi likh dii thii andhere kii lau | जब मस्तक पर ही लिख दी थी अँधेरे की लौ
- Simar Gozra
जब
मस्तक
पर
ही
लिख
दी
थी
अँधेरे
की
लौ
तो
फिर
हम
क्या
उसका
सुहाग
रौशन
करते
- Simar Gozra
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इस
तरह
वो
न
जलाएँ
हमको
है
मुहब्बत
तो
बताएँ
हमको
बद-दुआओं
ने
बचाया
वरना
ले
ही
डूबी
थी
दुआएँ
हमको
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Simar Gozra
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साथ
नहीं
है
इसीलिए
हम
होश
में
हैं
वो
साथ
होता
तो
हम
हैरत
में
होते
Simar Gozra
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उसको
कहना
कि
मुहब्बत
न
करे
गर
करे
तो
वो
शिकायत
न
करे
वस्ल
उस
शख़्स
से
हो
मेरा
जो
मरने
के
बाद
भी
हिजरत
न
करे
उसके
ही
शहर
के
शाइर
थे
सब
उसकी
फिर
कैसे
रिवायत
न
करे
ऐब
जब
उसके
गिनाने
मैं
लगूँ
फिर
कोई
उसकी
हिमायत
न
करे
टूटे
हैं
सारे
त'अल्लुक़
तो
अब
यार
वो
हम
से
अदावत
न
करे
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Simar Gozra
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पुर-सुकूँ
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
जो
बशर
बे-ख़ुदी
को
भूल
गया
प्यास
के
चलते
मरने
वाला
था
प्यास
बुझते
नदी
को
भूल
गया
घर
में
तब
घर
किया
अंधेरे
ने
जब
दिया
रौशनी
को
भूल
गया
जो
खड़ा
साथ
वक़्त-ए-उलझन
में
वक़्त
सुलझा
उसी
को
भूल
गया
क्या
है
मानी
सफ़र
का
जब
राही
मंज़िल-ए-आख़िरी
को
भूल
गया
ज़ोर
और
ज़ुल्म
में
फॅंसा
बंदा
तेरी
मौजूदगी
को
भूल
गया
नक़्ल-ए-दुनिया
में
मुब्तिला
इंसान
मक़सद-ए-ज़िंदगी
को
भूल
गया
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Simar Gozra
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उसकी
इक
तस्वीर
पड़ी
है
बटुए
में
जिसको
देख
के
मेरा
गुज़ारा
होता
है
Simar Gozra
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