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Shubham Mishra
dil-o-zehan men mere ghar kar ga.e tum
dil-o-zehan men mere ghar kar ga.e tum | दिल-ओ-ज़हन में मेरे घर कर गए तुम
- Shubham Mishra
दिल-ओ-ज़हन
में
मेरे
घर
कर
गए
तुम
असरदार
थे,
बे
असर
कर
गए
तुम
सजाकर
रखे
थे
जो
एहसास
अपने
अचानक
इधर
से
उधर
कर
गए
तुम
अकेले
सुकूँ
से
चले
जा
रहे
थे
मुसीबत
भरा
ये
सफ़र
कर
गए
तुम
किताब-ए-मुहब्बत
भी
छपती
हमारी
कहानी
मगर
मुख़्तसर
कर
गए
तुम
ये
आँखें
झुकी
सीं
ये
चेहरा
बुझा
सा
दग़ा
जान
मुझ
सेे
किधर
कर
गए
तुम
- Shubham Mishra
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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तुम्हें
हुस्न
पर
दस्तरस
है
मोहब्बत
वोहब्बत
बड़ा
जानते
हो
तो
फिर
ये
बताओ
कि
तुम
उस
की
आँखों
के
बारे
में
क्या
जानते
हो
ये
जुग़राफ़िया
फ़ल्सफ़ा
साईकॉलोजी
साइंस
रियाज़ी
वग़ैरा
ये
सब
जानना
भी
अहम
है
मगर
उस
के
घर
का
पता
जानते
हो
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Tehzeeb Hafi
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पहले
लगा
था
हिज्र
में
जाएँगे
जान
से
पर
जी
रहे
हैं
और
भी
हम
इत्मीनान
से
Ankit Maurya
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इश्क़
माशूक़
इश्क़
'आशिक़
है
यानी
अपना
ही
मुब्तला
है
इश्क़
Meer Taqi Meer
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जाँ
हम
दोनों
साथ
में
अच्छे
लगते
हैं
देखो
शे'र
मुकम्मल
अच्छा
लगता
है
Neeraj Neer
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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कहाँ
तक
साथ
दोगी
तुम
हमारा
सनम
जावेदाँ
है
यह
ग़म
हमारा
Avtar Singh Jasser
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पत्थर
के
ख़ुदा
पत्थर
के
सनम
पत्थर
के
ही
इंसाँ
पाए
हैं
तुम
शहर-ए-मोहब्बत
कहते
हो
हम
जान
बचा
कर
आए
हैं
Sudarshan Fakir
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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बिछड़
कर
हुआ
क्या
असर
देखना
है
कि
मानो
बिना
छत
के
घर
देखना
है
रहा
कम
अमीरों
से
नाता
हमारा
हमें
पाँव
से
ज़्यादा
सर
देखना
है
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Shubham Mishra
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रात
ख़ुदस
झगड़ते
रहे
तन्हा
हम
मोम
जैसे
पिघलते
रहे
तन्हा
हम
लौट
आते
जो
आवाज़
दे
देते
तुम
बेसबब
यार
चलते
रहे
तन्हा
हम
बात
थी
ग़म
ख़ुशी
साथ
बांटेंगे
सब
आँख
में
पानी
भरते
रहे
तन्हा
हम
क्या
सही
है
ग़लत
क्या
है
ये
जानने
उम्र
भर
ख़ुदस
लड़ते
रहे
तन्हा
हम
जो
गए
हम
अमीरों
की
बस्ती
में
कल
और
क्या
करते
बैठे
रहे
तन्हा
हम
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Shubham Mishra
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है
शकर
या
नमक
जानते
हो
नहीं
इस
ज़माने
को
पहचानते
हो
नहीं
किसलिए
मैं
कहूँगा
तुम्हें
कुछ
भी
अब
बात
सुनते
तो
हो
मानते
हो
नहीं
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Shubham Mishra
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जहाँ
अक़्सर
मुयस्सर
हो
वो
महफ़िल
ढूँढ़
लो
जाकर
भटकती
फिर
रही
कश्ती
का
साहिल
ढूँढ़
लो
जाकर
सुख़नवर
हैं
हमें
दुनिया
फ़क़त
पागल
बताएगी
यही
अच्छा
रहेगा
कोई
क़ाबिल
ढूँढ़
लो
जाकर
बड़े
उस्ताद
हो
तुम
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
में
हैं
ना
हमें
बख़्शो
कहीं
पर
और
हम
दिल
ढूँढ़
लो
जाकर
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Shubham Mishra
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दिल-ओ-ज़ेहन
में
मेरे
घर
कर
गए
तुम
असरदार
थे
बे-असर
कर
गए
तुम
सजाकर
रखे
थे
जो
एहसास
अपने
अचानक
इधर
से
उधर
कर
गए
तुम
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Shubham Mishra
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