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Shubham Mishra
raat khud se jhagadte rahe tanhaa ham
raat khud se jhagadte rahe tanhaa ham | रात ख़ुदस झगड़ते रहे तन्हा हम
- Shubham Mishra
रात
ख़ुदस
झगड़ते
रहे
तन्हा
हम
मोम
जैसे
पिघलते
रहे
तन्हा
हम
लौट
आते
जो
आवाज़
दे
देते
तुम
बेसबब
यार
चलते
रहे
तन्हा
हम
बात
थी
ग़म
ख़ुशी
साथ
बांटेंगे
सब
आँख
में
पानी
भरते
रहे
तन्हा
हम
क्या
सही
है
ग़लत
क्या
है
ये
जानने
उम्र
भर
ख़ुदस
लड़ते
रहे
तन्हा
हम
जो
गए
हम
अमीरों
की
बस्ती
में
कल
और
क्या
करते
बैठे
रहे
तन्हा
हम
- Shubham Mishra
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बस
एक
ही
दोस्त
है
दुनिया
में
अपना
मगर
उस
से
भी
झगड़ा
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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एक
आवाज़
कि
जो
मुझको
बचा
लेती
है
ज़िन्दगी
आख़री
लम्हों
में
मना
लेती
है
जिस
पे
मरती
हो
उसे
मुड़
के
नहीं
देखती
वो
और
जिसे
मारना
हो
यार
बना
लेती
है
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Ali Zaryoun
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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टूटते
रिश्तों
से
बढ़कर
रंज
था
इस
बात
का
दरमियाँ
कुछ
दोस्त
थे,
और
दोस्त
भी
ऐसे,
के
बस
Renu Nayyar
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एक
आवाज़
पे
आ
जाती
है
दौड़ी
दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान
नहीं
देखती
है
दोस्ती
दोस्ती
होती
है
तुम्हें
इल्म
नहीं
दोस्ती
फ़ाइदा
नुक़सान
नहीं
देखती
है
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Aadil Rasheed
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दोस्ती
लफ्ज़
ही
में
दो
है
दो
सिर्फ़
तेरी
नहीं
चलेगी
दोस्त
Zubair Ali Tabish
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आ
कि
तुझ
बिन
इस
तरह
ऐ
दोस्त
घबराता
हूँ
मैं
जैसे
हर
शय
में
किसी
शय
की
कमी
पाता
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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अब
कारगह-ए-दहर
में
लगता
है
बहुत
दिल
ऐ
दोस्त
कहीं
ये
भी
तिरा
ग़म
तो
नहीं
है
Majrooh Sultanpuri
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हाल
क्या
है
ज़िन्दगी
की
क्या
ख़बर
है
हाँ
वही
उस
आशिक़ी
की
क्या
ख़बर
है
थे
बड़े
मशहूर
तब
अल्फ़ाज़
उसके
है
कहाँ
उस
शा'इरी
की
क्या
ख़बर
है
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Shubham Mishra
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मैं
इन
अनजान
लोगों
में
सहारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
भटकती
कोई
कश्ती
हूँ
किनारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
भले
कितना
छुपाओ
इस
भरी
महफ़िल
में
तुम
ख़ुद
को
मगर
मैं
भीड़
में
झुमका
तुम्हारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
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Shubham Mishra
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लकीरों
में
मेरी
सलामत
हैं
कुछ
लोग
यक़ीनन
ख़ुदा
की
इनायत
हैं
कुछ
लोग
जभी
दिन
ढला,
रौशनी
बन
गए
वो
मिले
ज़िन्दगी
में
मुहब्बत
हैं
कुछ
लोग
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Shubham Mishra
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दिल-ओ-ज़ेहन
में
मेरे
घर
कर
गए
तुम
असरदार
थे
बे-असर
कर
गए
तुम
सजाकर
रखे
थे
जो
एहसास
अपने
अचानक
इधर
से
उधर
कर
गए
तुम
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Shubham Mishra
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है
शकर
या
नमक
जानते
हो
नहीं
इस
ज़माने
को
पहचानते
हो
नहीं
किसलिए
मैं
कहूँगा
तुम्हें
कुछ
भी
अब
बात
सुनते
तो
हो
मानते
हो
नहीं
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Shubham Mishra
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