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Shubham Mishra
main in anjaan logon men sahaara Dhoondh leta hooñ
main in anjaan logon men sahaara Dhoondh leta hooñ | मैं इन अनजान लोगों में सहारा ढूँढ़ लेता हूँ
- Shubham Mishra
मैं
इन
अनजान
लोगों
में
सहारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
भटकती
कोई
कश्ती
हूँ
किनारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
भले
कितना
छुपाओ
इस
भरी
महफ़िल
में
तुम
ख़ुद
को
मगर
मैं
भीड़
में
झुमका
तुम्हारा
ढूँढ़
लेता
हूँ
- Shubham Mishra
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चढ़ते
हुवे
ए
शम्स
दिखा
ताव
भी
मगर
ये
जान
ले
कि
शाम
ढले
डूब
जाएगा
Afzal Ali Afzal
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एक
कश्ती
क्यूँ
अभी
लौटी
नहीं
क्यूँ
किनारे
शाम
से
ख़ामोश
हैं
Umesh Maurya
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जो
उस
तरफ़
से
इशारा
कभी
किया
उस
ने
मैं
डूब
जाऊंगा
दरिया
को
पार
करते
हुए
Ghulam Murtaza Rahi
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कभी
कभी
तो
ये
वहशत
भी
हम
पे
गुज़री
है
कि
दिल
के
साथ
ही
देखा
है
डूबना
शब
का
Abhishek shukla
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नदी
को
कोसते
हैं
सब
किसी
के
डूब
जाने
पर
नदी
में
डूबते
को
पर
कोई
तिनका
नहीं
देता
Alankrat Srivastava
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बस
टूटी
कश्ती
ही
बतला
सकती
है
इक
दरिया
की
कितनी
शक्लें
होती
हैं
Soubhari Deepesh Sharma
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उनकी
आँखें
झील
हैं
तो
क्या
करें
डूब
जाएँ
काम
धंधा
छोड़
दें?
Saurabh Sharma 'sadaf'
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इतने
गहरे
उतर
गया
हूँ
दरिया-ए-दर्द-ए-दिल
में
हाथ
पकड़
कर
खींच
ले
वरना
डूब
के
भी
मर
सकता
हूँ
कट्टे
ख़ंजर
रस्सी
माचिस
कुछ
दिन
मुझ
सेे
दूर
रखो
कुछ
करने
से
चूक
गया
हूँ
मैं
कुछ
भी
कर
सकता
हूँ
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Vashu Pandey
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हमने
तुझ
पे
छोड़
दिया
है
कश्ती,
दरिया,
भँवर,
किनारा
Siddharth Saaz
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जब
भी
कश्ती
मिरी
सैलाब
में
आ
जाती
है
माँ
दु'आ
करती
हुई
ख़्वाब
में
आ
जाती
है
Munawwar Rana
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रात
ख़ुदस
झगड़ते
रहे
तन्हा
हम
मोम
जैसे
पिघलते
रहे
तन्हा
हम
लौट
आते
जो
आवाज़
दे
देते
तुम
बेसबब
यार
चलते
रहे
तन्हा
हम
बात
थी
ग़म
ख़ुशी
साथ
बांटेंगे
सब
आँख
में
पानी
भरते
रहे
तन्हा
हम
क्या
सही
है
ग़लत
क्या
है
ये
जानने
उम्र
भर
ख़ुदस
लड़ते
रहे
तन्हा
हम
जो
गए
हम
अमीरों
की
बस्ती
में
कल
और
क्या
करते
बैठे
रहे
तन्हा
हम
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Shubham Mishra
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हाल
क्या
है
ज़िन्दगी
की
क्या
ख़बर
है
हाँ
वही
उस
आशिक़ी
की
क्या
ख़बर
है
थे
बड़े
मशहूर
तब
अल्फ़ाज़
उसके
है
कहाँ
उस
शा'इरी
की
क्या
ख़बर
है
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Shubham Mishra
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बिछड़
कर
हुआ
क्या
असर
देखना
है
कि
मानो
बिना
छत
के
घर
देखना
है
रहा
कम
अमीरों
से
नाता
हमारा
हमें
पाँव
से
ज़्यादा
सर
देखना
है
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Shubham Mishra
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है
शकर
या
नमक
जानते
हो
नहीं
इस
ज़माने
को
पहचानते
हो
नहीं
किसलिए
मैं
कहूँगा
तुम्हें
कुछ
भी
अब
बात
सुनते
तो
हो
मानते
हो
नहीं
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Shubham Mishra
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लकीरों
में
मेरी
सलामत
हैं
कुछ
लोग
यक़ीनन
ख़ुदा
की
इनायत
हैं
कुछ
लोग
जभी
दिन
ढला,
रौशनी
बन
गए
वो
मिले
ज़िन्दगी
में
मुहब्बत
हैं
कुछ
लोग
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Shubham Mishra
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