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shashwat singh darpan
aur bhi log uspe marte hain
aur bhi log uspe marte hain | और भी लोग उसपे मरते हैं
- shashwat singh darpan
और
भी
लोग
उसपे
मरते
हैं
फूल
के
पास
चंद
भवरे
हैं
तुझको
ही
इश्क़
की
नहीं
है
ख़बर
वरना
तो
शहर
भर
में
चर्चे
हैं
रूठ
जाओ
के
रूठने
वाले
रूठने
से
भी
मान
जाते
हैं
ज़हन-ओ-दिल
में
ख़याल
हैं
तेरे
जैसे
ज़िंदान
में
परिंदे
हैं
तू
किसी
और
को
मय्यसर
है
हम
तेरी
आरज़ू
से
लिपटे
हैं
फिर
न
जाने
मिलोगे
कब
हम
सेे
आओ
तस्वीर
खींच
लेते
हैं
एक
दर्पन
है
दायरा
इनका
अक्स
तेरे
यहीं
भटकते
हैं
- shashwat singh darpan
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इस
तरह
करता
है
हर
शख़्स
सफ़र
अपना
ख़त्म
ख़ुद
को
तस्वीर
में
रखता
है
चला
जाता
है
Sandeep kumar
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चाँद
भी
हैरान
दरिया
भी
परेशानी
में
है
अक्स
किस
का
है
कि
इतनी
रौशनी
पानी
में
है
Farhat Ehsaas
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भेज
देता
हूँ
मगर
पहले
बता
दूँ
तुझ
को
मुझ
से
मिलता
नहीं
कोई
मिरी
तस्वीर
के
बाद
Umair Najmi
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घर
भरा
होता
है
पर
एक
कमी
होती
है
एक
तस्वीर
बहुत
हँसती
हुई
होती
है
जिनको
चारागरों
की
सूईयाँ
नहीं
चुभती
हैं
ऐसे
बच्चों
को
कोई
बात
चुभी
होती
है
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Rishabh Sharma
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बस
तेरी
तस्वीर
ही
इक
पास
थी
उस
में
भी
तू
बेख़बर
सोई
हुई
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S M Afzal Imam
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मेरी
इक
तस्वीर
देखी
तुमने
पल
भर
प्यार
से
और
वो
तस्वीर
उस
पल
और
प्यारी
हो
गई
Sanskriti Shree
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सिर्फ़
तस्वीर
रह
गई
बाक़ी
जिस
में
हम
एक
साथ
बैठे
हैं
Bilal Ameer Ahmad
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सोचता
हूँ
वक़्त
की
तस्वीर
जब
मुझ
सेे
बनेगी
तो
भला
उसकी
कलाई
पर
घड़ी
कैसी
लगेगी
चाय
उस
से
पूछ
तो
सकता
हूँ
मैं
भी
दोस्त,लेकिन
सोचता
हूँ
कौन
सा
वो
कहने
भर
से
चल
पड़ेगी
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Abhishar Geeta Shukla
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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देर
तक
आँख
मुसीबत
में
पड़ी
रहती
है
तुम
चले
जाते
हो,
तस्वीर
बनी
रहती
है
Fauziya Rabab
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इन
अँधेरों
की
आशिक़ी
मुझ
सेे
छीन
लेगी
ये
रौशनी
मुझ
सेे
बंद
की
अपनी
आँख
तब
जा
कर
उसकी
बंद-ए-क़बा
खुली
मुझ
सेे
मीर
जी
हँस
के
बात
करती
है
पंखुड़ी
इक
गुलाब
सी
मुझ
सेे
लोग
इतने
मरे
मेरे
अंदर
लाश
गिनते
नहीं
बनी
मुझ
सेे
राम
कह
कर
के
बात
करती
है
ख़्वाब
में
मेरी
जानकी
मुझ
सेे
होंगे
शायर
बहुत
मगर
दर्पन
जानी
जाएगी
ये
सदी
मुझ
सेे
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shashwat singh darpan
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अर्जुन
को
सोचना
है
लड़ेगा
वो
या
नहीं
गिरधर
ने
ऐसे
मोड़
पे
की
अपनी
बात
ख़त्म
shashwat singh darpan
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माँ
बाबा
का
सोच
के
हर
दम
रुक
जाता
हूँ
वरना
तो
इतने
ग़म
में
मैंने
पंखे
से
टँग
कर
मर
जाना
था
shashwat singh darpan
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खिलाड़ी
देवकीनंदन
के
जैसा
सामने
हो
तो
तजुर्बा
लाख
हो
शकुनी
भी
चौसर
हार
जाते
हैं
shashwat singh darpan
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ये
दुनिया
एक
दोज़ख़
है
जहाँ
पर
कहीं
से
लोग
मर
कर
आ
रहे
हैं
shashwat singh darpan
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