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Shan Sharma
sirf ik main hooñ jisne dil khoya
sirf ik main hooñ jisne dil khoya | सिर्फ़ इक मैं हूँ जिसने दिल खोया
- Shan Sharma
सिर्फ़
इक
मैं
हूँ
जिसने
दिल
खोया
कुछ
ग़लत
है
तिरे
हिसाबों
में
- Shan Sharma
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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देखिए
होगा
श्री-कृष्ण
का
दर्शन
क्यूँँ-कर
सीना-ए-तंग
में
दिल
गोपियों
का
है
बेकल
Mohsin Kakorvi
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जब
ज़रा
रात
हुई
और
मह
ओ
अंजुम
आए
बार-हा
दिल
ने
ये
महसूस
किया
तुम
आए
Asad Bhopali
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ज़िंदगी
भर
के
लिए
दिल
पे
निशानी
पड़
जाए
बात
ऐसी
न
लिखो,
लिख
के
मिटानी
पड़
जाए
Aadil Rasheed
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हर
धड़कते
पत्थर
को
लोग
दिल
समझते
हैं
'उम्रें
बीत
जाती
हैं
दिल
को
दिल
बनाने
में
Bashir Badr
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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तिरंगा
दिल
में
है
लबों
पे
हिंदुस्तान
रखता
हूँ
सिपाही
हूँ
हथेली
पे
मैं
अपनी
जान
रखता
हूँ
Shashank Shekhar Pathak
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रात
भर
आँख
पानी-पानी
थी
अश्क़
थे
इश्क़
की
निशानी
थी
तू
था
यकसर
जहाँ
मुझे
हासिल
यार
दिलकश
बहुत
कहानी
थी
दूर
हैं
हम
तो
पड़
गई
नीली
साथ
थे
शाम
ज़ाफ़रानी
थी
नाम
वैसे
ग़ुलाम
मेरा
था
शाह
की
पर
ग़ुलाम
रानी
थी
ज़ुल्फ़
उसकी
तराश
देता
था
मेरी
ख़ातिर
ये
बाग़वानी
थी
सब
नए
ख़त
जला
दिए
मैंने
बात
उन
में
वही
पुरानी
थी
वस्ल
के
दौर
जो
थी
आँखों
में
'शान'
वो
बूँद
शादमानी
थी
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Shan Sharma
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यहाँ
ख़त
हैं
लिखे
रक्खे
कई
बेनाम
बेमंज़िल
मुझे
डर
है
कि
क़ासिद
ख़त
सर-ए-अख़बार
करता
है
Shan Sharma
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वो
लड़की
है
शातिर
दुनियादारी
में
इश्क़
मुहब्बत
में
पर
थोड़ी
मद्धम
है
Shan Sharma
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आपके
रब्त
पर
ज़ुबाँ
ठहरी
लफ्ज़
महरूम
दास्ताँ
ठहरी
मैं
बयाँ
इश्क़
को
न
कर
पाया
नज़्म
भी
मेरी
बेज़ुबाँ
ठहरी
इक
सितारा
ही
मैंने
चाहा
था
हाथ
में
आ
के
कहकशाँ
ठहरी
इक
ख़ुशी
ही
नहीं
ठहर
पाई
बे-क़रारी
जहाँ-तहाँ
ठहरी
मेरी
आवारगी
को
देखा
जब
फिर
न
कोई
गली
यहाँ
ठहरी
सब्र
का
फल
रहा
न
शीरीं
अब
देर
की
तो
न
गाड़ियाँ
ठहरी
आप
भी
हो
ग़लत
फ़हम
तब
से
तल्ख़ियाँ
जब
से
दरमियाँ
ठहरी
रुक
गई
ज़िन्दगी
जो
बिछड़े
हम
'
शान
'
पर
ये
क़लम
कहाँ
ठहरी
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Shan Sharma
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अव्वल
तो
दिल
तन्हा-तन्हा
जलता
है
दोज़ख
जैसे
फिर
ये
सीना
जलता
है
सीली
तेरी
याद
हमेशा
बच
जाती
मेरा
लेक़िन
कतरा-कतरा
जलता
है
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Shan Sharma
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