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Shan Sharma
likhi thii jo tumhein benaam sii vo chitthiyan hain
likhi thii jo tumhein benaam sii vo chitthiyan hain | लिखी थी जो तुम्हें बेनाम सी वो चिट्ठियाँ हैं
- Shan Sharma
लिखी
थी
जो
तुम्हें
बेनाम
सी
वो
चिट्ठियाँ
हैं
कहीं
थोड़ी
शिकायत
है
कहीं
कुछ
अर्ज़ियाँ
हैं
तुम्हारे
बाद
दिल
में
याद
ठहरी
और
घर
में
जले
फ़िल्टर
रखे
हैं
और
थोड़ी
तीलियाँ
हैं
- Shan Sharma
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अव्वल
तो
दिल
तन्हा-तन्हा
जलता
है
दोज़ख
जैसे
फिर
ये
सीना
जलता
है
सीली
तेरी
याद
हमेशा
बच
जाती
मेरा
लेक़िन
कतरा-कतरा
जलता
है
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Shan Sharma
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रात
भर
आँख
पानी-पानी
थी
अश्क़
थे
इश्क़
की
निशानी
थी
तू
था
यकसर
जहाँ
मुझे
हासिल
यार
दिलकश
बहुत
कहानी
थी
दूर
हैं
हम
तो
पड़
गई
नीली
साथ
थे
शाम
ज़ाफ़रानी
थी
नाम
वैसे
ग़ुलाम
मेरा
था
शाह
की
पर
ग़ुलाम
रानी
थी
ज़ुल्फ़
उसकी
तराश
देता
था
मेरी
ख़ातिर
ये
बाग़वानी
थी
सब
नए
ख़त
जला
दिए
मैंने
बात
उन
में
वही
पुरानी
थी
वस्ल
के
दौर
जो
थी
आँखों
में
'शान'
वो
बूँद
शादमानी
थी
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Shan Sharma
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कभी
जो
कह
गए
थे
लफ़्ज़
तुम
यूँँ
ही
हँसी
में
तुम्हें
मालूम
वो
मेरे
लिए
अब
बद्दुआ
हैं
Shan Sharma
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इक
ख़ुशी
ही
नहीं
ठहर
पाई
बे-क़रारी
जहाँ-तहाँ
ठहरी
Shan Sharma
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क्या
मिली
कुछ
इलाजकारी
है
जौन
मुझको
भी
बेक़रारी
है
तुम
तो
पहले
गुज़ार
बैठे
थे
ग़म
की
शब
मैंने
क्यूँ
गुज़ारी
है
ऐन
फिर
शीन
काफ़
के
जुमले
इश्क़
बदहाल
लत
हमारी
है
दौर
है
ये
हसीन
सूरत
का
ज़ख़्म
की
दिल
पे
दाग़दारी
है
मुस्कुराहट
लबों
पे
तारी
है
हाँ
मगर
वो
भी
झूठ
सारी
है
मैं
वो
बदज़ात
हूँ
कि
अब
जिसको
ख़ुल्द
की
धूल
ना-गवारी
है
चाँद
की
चाहतें
बसर
कर
के
आँख
लगती
चकोर
भारी
है
'शान'
टुकड़ों
में
जोड़
के
जी
लो
ज़िंदगी
साँस
की
सवारी
है
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Shan Sharma
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