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Shan Sharma
kabhi achha kabhi zaalim hazaaron jiski shakle
kabhi achha kabhi zaalim hazaaron jiski shakle | कभी अच्छा कभी ज़ालिम हज़ारों जिसकी शक़्लें
- Shan Sharma
कभी
अच्छा
कभी
ज़ालिम
हज़ारों
जिसकी
शक़्लें
भला
फ़ितरत
बयाँ
उसकी
मुसव्विर
क्या
करेंगे
- Shan Sharma
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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हमारा
इश्क़
इबादत
का
अगला
दर्जा
है
ख़ुदा
ने
छोड़
दिया
तो
तुम्हारा
नाम
लिया
ग़मों
से
बैर
था
सो
हमने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
शजर
ने
गिर
के
परिंदों
से
इन्तेक़ाम
लिया
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Balmohan Pandey
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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सरफ़रोशी
की
तमन्ना
अब
हमारे
दिल
में
है
देखना
है
ज़ोर
कितना
बाज़ू-ए-क़ातिल
में
है
Bismil Azimabadi
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ये
ख़ुशी
सिगरटें
समझती
हैं
छोड़ता
सोग
आसमाँ
पर
मैं
Shan Sharma
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इक
ख़ुशी
ही
नहीं
ठहर
पाई
बे-क़रारी
जहाँ-तहाँ
ठहरी
Shan Sharma
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तू
चले
जा
तुझे
भुला
दूँगा
आज
ये
फ़ैसला
सुना
दूँगा
उम्र
भर
दी
तुझे
हैं
तकलीफ़ें
दूर
हो
जा
तुझे
दु'आ
दूँगा
ज़ख़्म
तुझको
नवाज़
दूँ
भी
गर
पर
न
धोखा
मैं
दिलरुबा
दूँगा
है
मिरा
कौन
एक
तू
ही
है
सब्र
कर
दिल
तिरा
दुखा
दूँगा
डायरी
शा'इरी
से
भर
के
मैं
आग
दिल
की
मिरी
बुझा
दूँगा
छोड़
दहलीज़
आ
गया
बाहर
ज़ौम
था
ये
जहाँ
घुमा
दूँगा
दर्द
देकर
मुझे
अभी
हँस
ले
एक
दिन
ग़म
तुझे
ख़ुदा
दूँगा
सौंप
आऊँ
तुझे
उसे
पहले
नाव
फिर
मैं
मिरी
डुबा
दूँगा
शान
थोड़ा
बचा
के
मैं
मुझ
में
जो
भी
बाक़ी
बचा
लुटा
दूँगा
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Shan Sharma
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आपके
रब्त
पर
ज़ुबाँ
ठहरी
लफ्ज़
महरूम
दास्ताँ
ठहरी
मैं
बयाँ
इश्क़
को
न
कर
पाया
नज़्म
भी
मेरी
बेज़ुबाँ
ठहरी
इक
सितारा
ही
मैंने
चाहा
था
हाथ
में
आ
के
कहकशाँ
ठहरी
इक
ख़ुशी
ही
नहीं
ठहर
पाई
बे-क़रारी
जहाँ-तहाँ
ठहरी
मेरी
आवारगी
को
देखा
जब
फिर
न
कोई
गली
यहाँ
ठहरी
सब्र
का
फल
रहा
न
शीरीं
अब
देर
की
तो
न
गाड़ियाँ
ठहरी
आप
भी
हो
ग़लत
फ़हम
तब
से
तल्ख़ियाँ
जब
से
दरमियाँ
ठहरी
रुक
गई
ज़िन्दगी
जो
बिछड़े
हम
'
शान
'
पर
ये
क़लम
कहाँ
ठहरी
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Shan Sharma
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शराफ़त
रात
में
तुम
'शान'
अक्सर
भूल
जाते
हो
सुनो
तुम
दस
बजे
के
बाद
मुझ
सेे
बात
मत
करना
Shan Sharma
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