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shampa andaliib
gar ziyaada nahin to thodii ho
gar ziyaada nahin to thodii ho | गर ज़ियादा नहीं तो थोड़ी हो
- shampa andaliib
गर
ज़ियादा
नहीं
तो
थोड़ी
हो
बात
कुछ
देर
हो
पर
अच्छी
हो
एक
कमरा
हो
कुछ
किताबें
हों
और
खिड़की
से
धूप
आती
हो
क्या
ज़रूरत
पड़े
किसी
की
अगर
दोस्त
में
बात
दोस्त
जैसी
हो
ऐसी
ख़्वाहिश
पनप
गई
दिल
में
उम्र
कट
जाए
जो
न
पूरी
हो
जाने
किस
कैफ़ियत
में
होगा
वो
जिस
को
हर
एक
बात
चुभती
हो
ऐसे
लोगों
से
बात
क्या
की
जाए
जिन
की
हर
एक
बात
झूठी
हो
जाने
वाले
चले
गए
शम्पा
आप
किस
कैफ़ियत
में
बैठी
हो
- shampa andaliib
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साथ
साया
तक
नहीं
है
हम
अकेले
रो
रहे
हैं
shampa andaliib
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कल
की
बातों
पे
ग़ौर
मत
कर
देख
मेरे
चेहरे
पे
अब
उदासी
है
shampa andaliib
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दुनिया
ये
हम
को
एक
तरीक़े
से
देखती
वैसे
मैं
हर
तरह
से
हूँ
लोगों
से
मुख़्तलिफ़
shampa andaliib
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तीरगी
में
कुछ
नहीं
बस
तीरगी
है
घर
के
बाहर
देख
कितनी
रौशनी
है
एक
जैसे
सुख
हैं
सब
के
और
दुख
भी
जो
तुम्हारी
वो
हमारी
ज़िंदगी
है
एक
वो
है
एक
वो
है
एक
वो
उफ़
और
किस
किस
से
तुम्हारी
दोस्ती
है
ये
अगर
मैं
भी
नहीं
तो
कौन
है
फिर
आइने
में
कौन
मुझ
पर
हँस
रही
है
सीधी
सादी
बात
है
गर
कोई
समझे
दोस्त
दुश्मन
आदमी
का
आदमी
है
पहले
जैसा
कुछ
नहीं
इस
दौर
में
अब
हर
किसी
को
हर
कोई
अब
अजनबी
है
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सब
मुक़द्दर
का
खेल
होता
है
अपने
हाथों
में
कुछ
नहीं
होता
shampa andaliib
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