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shampa andaliib
kal ki baaton pe gaur mat kar dekh
kal ki baaton pe gaur mat kar dekh | कल की बातों पे ग़ौर मत कर देख
- shampa andaliib
कल
की
बातों
पे
ग़ौर
मत
कर
देख
मेरे
चेहरे
पे
अब
उदासी
है
- shampa andaliib
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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मुझे
रोना
नहीं
आवाज़
भी
भारी
नहीं
करनी
मोहब्बत
की
कहानी
में
अदाकारी
नहीं
करनी
Afzal Khan
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सभी
के
साथ
दिखना
भी
मगर
सब
सेे
जुदा
रहना
भी
है
उसको
उदासी
साथ
भी
रखनी
है
और
तस्वीर
में
हँसना
भी
है
उसको
Kafeel Rana
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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अब
उदास
फिरते
हो
सर्दियों
की
शामों
में
इस
तरह
तो
होता
है
इस
तरह
के
कामों
में
Shoaib Bin Aziz
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पेड़
को
काटने
वाले
क्या
जाने
दुख
हम
गले
लग
नहीं
सकते
दीवार
से
Neeraj Neer
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लम्हे
उदास
उदास
फ़ज़ाएं
घुटी
घुटी
दुनिया
अगर
यही
है
तो
दुनिया
से
बच
के
चल
Shakeel Badayuni
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शाम
भी
थी
धुआँ
धुआँ
हुस्न
भी
था
उदास
उदास
दिल
को
कई
कहानियाँ
याद
सी
आ
के
रह
गईं
Firaq Gorakhpuri
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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उसी
मक़ाम
पे
कल
मुझ
को
देख
कर
तन्हा
बहुत
उदास
हुए
फूल
बेचने
वाले
Jamal Ehsani
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मेरे
दिल
में
भी
घर
कर
गई
ख़ामोशी
उसने
भी
कुछ
यार
तवज्जोह
कम
कर
दी
shampa andaliib
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किरदार
के
हिसाब
से
चलती
रहूँगी
मैं
लाज़िम
है
मुझ
को
राह
में
कुछ
मुश्किलें
मिलें
shampa andaliib
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तुम्हारा
नाम
ले
कर
जी
रहे
हैं
अलग
कुछ
काम
ले
कर
जी
रहे
हैं
कभी
दिन
ठीक
से
गुज़रा
नहीं
है
दिलों
में
शाम
ले
कर
जी
रहे
हैं
अज़ल
से
रूह
की
पूरी
मदद
से
दिल-ए-नाकाम
ले
कर
जी
रहे
हैं
हटाओ
हाथ
सर
रक्खो
जिगर
पे
बहुत
इल्ज़ाम
ले
कर
जी
रहे
हैं
कभी
तो
देख
कर
लगता
है
ख़ुद
को
कोई
हम-नाम
ले
कर
जी
रहे
हैं
हमारे
दिल
से
क्या
फूटेगा
यारों
फ़क़त
कोहराम
ले
कर
जी
रहे
हैं
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shampa andaliib
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इक
ज़माना
गुज़र
गया
ख़ुद
को
मुस्कुराते
हुए
नहीं
देखा
shampa andaliib
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हम
को
दोषी
ठहराते
हैं
ख़ुद
ही
लोग
बदल
जाते
हैं
अपनों
की
बातें
सुन
कर
हम
अब
मन
ही
मन
घबराते
हैं
उन
को
कोई
दुख
नइँ
होता
जो
अपना
रोना
गाते
हैं
रोज़
दु'आ
में
रब
से
बोलूँ
जाने
वाले
कब
आते
हैं
छोड़
के
दुनिया-दारी
मुझ
को
अब
चंदा
तारे
भाते
हैं
पागल
क़ासिद
लौटा
कर
अब
मेरी
चिट्ठी
ले
आते
हैं
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shampa andaliib
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