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Shakir Dehlvi
ham khade rahte hain mujrim ki tarah mehfil men
ham khade rahte hain mujrim ki tarah mehfil men | हम खड़े रहते हैं मुजरिम की तरह महफ़िल में
- Shakir Dehlvi
हम
खड़े
रहते
हैं
मुजरिम
की
तरह
महफ़िल
में
उनका
अंदाज़
वकीलों
की
तरह
होता
है
- Shakir Dehlvi
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मुझ
सेे
होकर
के
ही
बे-ज़ार
चले
जाते
हैं
मेरी
महफ़िल
से
मेरे
यार
चले
जाते
हैं
मुझको
मालूम
है
रहता
नहीं
है
अब
वो
वहाँँ
साल
में
फिर
भी
हम
इक
बार
चले
जाते
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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ये
गूँगों
की
महफ़िल
है
निकलना
ही
पड़ेगा
क्या
इतनी
ख़ता
कम
है
कि
हम
बोल
पड़े
हैं
Waseem Barelvi
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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ज़ेहन
से
यादों
के
लश्कर
जा
चुके
वो
मेरी
महफ़िल
से
उठ
कर
जा
चुके
मेरा
दिल
भी
जैसे
पाकिस्तान
है
सब
हुकूमत
करके
बाहर
जा
चुके
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Tehzeeb Hafi
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दर्द
की
बात
किसी
हँसती
हुई
महफ़िल
में
जैसे
कह
दे
किसी
तुर्बत
पे
लतीफ़ा
कोई
Ahmad Rahi
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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फिर
उसने
खोल
दिए
सारे
रास्ते
मुझ
पर
वो
थक
गया
था
मेरा
सब्र
आज़माते
हुए
Shakir Dehlvi
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दूसरों
का
जो
ग़म
समझते
हैं
हम
उन्हें
मोहतरम
समझते
हैं
मुश्किलों
को
सितम
समझते
हैं
तेरी
हिकमत
को
कम
समझते
हैं
होंठ
जलते
हैं
मुस्कुराने
से
आप
रहने
दें
हम
समझते
हैं
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Shakir Dehlvi
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क्या
तमाशा
है
कि
कांधों
पे
नहीं
सर
फिर
भी
दोनों
हाथों
से
हैं
दस्तार
सँभाले
हुए
लोग
Shakir Dehlvi
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हमारे
घर
में
ये
तहज़ीब
अब
भी
ज़िन्दा
है
बुज़ुर्ग
बोलें
तो
बच्चे
ख़मोश
रहते
हैं
Shakir Dehlvi
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क़र्ज़
दशरथ
के
वचन
का
यूँँ
चुकाया
राम
ने
सर
झुकाया
और
ख़ुशी
से
राजधानी
छोड़
दी
Shakir Dehlvi
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