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Adnan Ali SHAGAF
achha to ishq karna tum hi ha
achha to ishq karna tum hi ha | अच्छा तो इश्क़ करना तुम ही हमें सिखा दो
- Adnan Ali SHAGAF
अच्छा
तो
इश्क़
करना
तुम
ही
हमें
सिखा
दो
जैसा
कि
तुम
कहोगे
बस
हू-ब-हू
करेंगे
- Adnan Ali SHAGAF
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इज़हार-ए-इश्क़
उस
से
न
करना
था
'शेफ़्ता'
ये
क्या
किया
कि
दोस्त
को
दुश्मन
बना
दिया
Mustafa Khan Shefta
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देखो
तुम
ने
इश्क़
किया
है
शायर
से
शे'र
कहेगा
ज़ेवर
थोड़ी
ला
देगा
Kumar Kaushal
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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जब
चाहें
सो
जाते
थे
हम,
तुम
सेे
बातें
करके
तब
उल्टी
गिनती
गिनने
से
भी
नींद
नहीं
आती
है
अब
इश्क़
मुहब्बत
पर
ग़ालिब
के
शे'र
सुनाए
उसको
जब
पहले
थोड़ा
शरमाई
वो
फिर
बोली
इसका
मतलब?
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Tanoj Dadhich
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दूजा
इश्क़
किया
तो
ये
मालूम
हुआ
पहले
वाले
में
भी
ग़लती
मेरी
थी
Tanoj Dadhich
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वफ़ा
का
ज़ोर
अगर
बाज़ुओं
में
आ
जाए
चराग़
उड़ता
हुआ
जुगनुओं
में
आ
जाए
खिराजे
इश्क़,
कहीं
जा
के
तब
अदा
होगा
हमारा
ख़ून
अगर
आँसुओं
में
आ
जाए
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Hashim Raza Jalalpuri
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इश्क़
पहले
बना
था
जाने
जाँ
नींद
की
गोलियाँ
बनीं
थीं
फिर
Ashutosh Kumar "Baagi"
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ये
है
पहली
बात
तुझ
सेे
इश्क़
है
दूसरी
ये
बात,
पहली
बात
सुन
Siddharth Saaz
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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सीने
में
तो
काँटे
ही
नहीं
हैं
दिल
में
फिर
ये
चुभन
क्यूँ
है
माना
कि
ख़ुदा
है
साथ
मेरे
फिर
भी
ये
अकेलापन
क्यूँ
है
Adnan Ali SHAGAF
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अनकही
आगही
से
ख़तरा
है
सो
मुझे
शा'इरी
से
ख़तरा
है
जो
सभी
का
जला
रही
है
दिल
गाँव
की
फुलझड़ी
से
ख़तरा
है
नहर
पर
क्या
किसी
का
ध्यान
नहीं
इसकी
आलूदगी
से
ख़तरा
है
काफ़ी
पुर-अम्न
है
अज़ीमाबाद
बस
ग़लत
संगती
से
ख़तरा
है
मान्यताएँ
हैं
अपनी
अपनी
मगर
कुछ
तो
जादूगरी
से
ख़तरा
है
दिल
है
आवारगी
पसंद
"शगफ़"
माँ
को
आवारगी
से
ख़तरा
है
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Adnan Ali SHAGAF
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मुफ़्त
जो
बन
सके
मुझे
बेचें
आप
भी
अपने
मशवरे
बेचें
डिग्रियाँ
बेचना
ही
काफ़ी
नहीं
अपने
हिस्सों
के
तजरबे
बेचें
वरना
ये
ख़ून
भी
तो
पानी
है
आओ
कुछ
क़तरे
ख़ून
के
बेचें
हमने
वा'दा
किया
है
ख़ुशियों
का
क्यूँ
ग़मों
को
हम
आपसे
बेचें
सुनो
ऐ
घोड़े
बेचने
वाली
हम
भला
किसको
रतजगे
बेचें
सुनते
हैं
वो
बहुत
पटाखा
है
उसके
घर
पर
चलो
दिए
बेचें
हम
नहीं
ज़ेवरात
के
शौक़ीन
हम
जवानों
को
असलहे
बेचें
दाम
मुँह
माँगी
ले
लें
और
हमें
अपने
होंठों
के
ज़ाएक़े
बेचें
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Adnan Ali SHAGAF
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कुछ
कर
नहीं
रहे
तो
इक
काम
कीजिएगा
बाँहों
में
आके
मेरे
आराम
कीजिएगा
Adnan Ali SHAGAF
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मैं
तो
कहता
था
बस
सँभल
जाओ
यूँँ
नहीं
था
कि
तुम
बदल
जाओ
मोम
हाथों
में
लेके
बैठा
हूँ
अब
भी
मौक़ा
है
तुम
पिघल
जाओ
हाथ
की
नब्ज़
काट
बैठा
हूँ
ख़ूँ
के
ज़रिए
ही
तुम
निकल
जाओ
मेरी
आँखों
को
आइना
समझो
और
इन
में
ही
आके
ढल
जाओ
अब
ये
आलम
भी
टलने
वाला
है
अब
शगफ़
तुम
भी
याँ
से
टल
जाओ
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Adnan Ali SHAGAF
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