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Shaad Imran
aisa nahin ki maine mohabbat nahin kari
aisa nahin ki maine mohabbat nahin kari | ऐसा नहीं कि मैंने मोहब्बत नहीं करी
- Shaad Imran
ऐसा
नहीं
कि
मैंने
मोहब्बत
नहीं
करी
इज़हार
करने
ही
कि
बस
हिम्मत
नहीं
करी
- Shaad Imran
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इश्क़
में
ये
दावा
तो
नईं
है
मैं
ही
अव्वल
आऊँगा
लेकिन
इतना
कह
सकता
हूँ
अच्छे
नंबर
लाऊँगा
Zubair Ali Tabish
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इश्क़
माशूक़
इश्क़
'आशिक़
है
यानी
अपना
ही
मुब्तला
है
इश्क़
Meer Taqi Meer
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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बाद
में
तुम
से
इश्क़
कर
लेंगे
पहले
ख़ुदस
तो
प्यार
कर
लें
हम
Shadab Asghar
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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ये
मोहब्बत
के
महल
तामीर
करना
छोड़
दे
मैं
भी
शहज़ादा
नहीं
हूँ
तू
भी
शहज़ादी
नहीं
Afzal Khan
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इश्क़
पर
ज़ोर
नहीं
है
ये
वो
आतिश
'ग़ालिब'
कि
लगाए
न
लगे
और
बुझाए
न
बने
Mirza Ghalib
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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अगर
बेदाग़
होता
चाँद
तो
अच्छा
नहीं
लगता
मोहब्बत
ख़ूब-सूरत
दाग़
है,
बेदाग़
से
दिल
पर
Umesh Maurya
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मैं
सात
साल
से
अब
तक
हिसार-ए-इश्क़
में
हूँ
वो
शख़्स
आज
भी
मेरे
दिल-ओ-दिमाग़
में
है
Amaan Haider
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आरज़ू
दीद-ए-ख़ुदा
की
है
आरज़ू
भी
हमनें
क्या
की
है
तुझको
देखें
तो
होश
ही
न
रहे
अदाएँ
इस
क़दर
बला
की
है
किसी
सूरत
तुझे
अपना
बना
ले
बात
लेकिन
तेरी
रज़ा
की
है
तुमने
जिस
से
भी
की
बे-वफ़ाई
की
हमने
जिस
से
भी
की
वफ़ा
की
है
शा'इरी
होगी
उसी
शख़्स
से
"शाद"
ज़िन्दगी
जिसने
भी
तबाह
की
है
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Shaad Imran
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जितने
अपने
हैं
सब
पराए
हैं
बात
जानी
जब
ज़ख़्म
खाए
हैं
ये
सब
शराबी
कोई
और
नहीं
जाँ
तेरे
ठुकराए,
तेरे
सताए
हैं
ख़ून
थूका
तेरे
जाने
के
ग़म
मैं
हमनें
सिर्फ़
आँसू
नहीं
बहाए
हैं
मस्जिद
एक
रोज़
बुलाया
वाईज
ने
हमने
कह
दिया
नहीं
नहाए
हैं
मौत
पढ़ती
है
काम
करने
में
'शाद'
सिर्फ़
बातें
ही
बनाए
हैं
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Shaad Imran
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मैं
न
अच्छा
न
बुरा
निकला
मुझ
सेे
हर
शख़्स
क्यूँँ
ख़फ़ा
निकला
रहा
भलाई
का
ज़माना
नहीं
यही
हर
बार
तजुर्बा
निकला
जिसको
देखा
नहीं
किसी
ने
कभी
ये
ग़ज़ब
है
कि
वो
ख़ुदा
निकला
चाहने
वालों
में
तेरे
सब
सेे
अव्वल
मेरा
ही
नाम
हर
दफ़ा
निकला
देख
कर
होश
खो
बैठी
यशोदा
लाल
के
मुँह
में
कहकशां
निकला
'शाद'
तेरा
इश्क़
एक
तरफ़ा
था
फिर
क्यूँँ
कहना
वो
बे-वफ़ा
निकला
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Shaad Imran
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आजकल
हम
जफ़ा
पे
लिखते
हैं
यानी
तेरी
अदा
पे
लिखते
हैं
दिल
कभी
दीवार
और
कभी-कभी
तो
हम
तिरा
नाम
हवा
पे
लिखते
हैं
ज़िन्दगी
खेल
नहीं
पतंगों
का
चलो
ये
आसमाँ
पे
लिखते
हैं
आज
फिर
याद
घर
की
आई
है
आज
फिर
कुछ
माँ
पे
लिखते
हैं
'शाद'
क्या
दौर
आया
शा'इरी
का
लोग
सिर्फ़
बे-वफ़ा
पे
लिखते
हैं
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Shaad Imran
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कुछ
चीज़ें
तन्हा
अच्छी
हैं
जैसे
चाँद,
ख़ुदा
और
मैं
Shaad Imran
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