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Sarvjeet Singh
use is baat ka dar hai kahiin kuchh chhoot jaayega
use is baat ka dar hai kahiin kuchh chhoot jaayega | उसे इस बात का डर है कहीं कुछ छूट जाएगा
- Sarvjeet Singh
उसे
इस
बात
का
डर
है
कहीं
कुछ
छूट
जाएगा
मुझे
इस
बात
का
डर
है
कहीं
सब
कुछ
न
मिल
जाए
- Sarvjeet Singh
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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अक्स-दर-अक्स
बिखरना
है
मुझे
जाने
क्या
टूट
गया
है
मुझ
में
Khalid Moin
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दिया
जला
के
सभी
बाम-ओ-दर
में
रखते
हैं
और
एक
हम
हैं
इसे
रह-गुज़र
में
रखते
हैं
समुंदरों
को
भी
मालूम
है
हमारा
मिज़ाज
कि
हम
तो
पहला
क़दम
ही
भँवर
में
रखते
हैं
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Abrar Kashif
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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डर
मुझे
मेरी
मुहब्बत
एक
दिन
खो
जाएगी
यार
मुझको
लग
रहा
वो
ग़ैर
की
हो
जाएगी
मैं
सभी
वादे
पुराने
ही
निभाते
जाऊँगा
और
वो
जाकर
किसी
की
बाँह
में
सो
जाएगी
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Ravi 'VEER'
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रुके
रुके
से
क़दम
रुक
के
बार
बार
चले
क़रार
दे
के
तिरे
दर
से
बे-क़रार
चले
Gulzar
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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बस
इक
ख़्वाब
अभी
सोया
है
आँख
न
मींचो
जग
जाएगा
Sarvjeet Singh
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इस
दिल
का
आलम
लिखता
हूँ
पर
अब
काफ़ी
कम
लिखता
हूँ
लिखने
को
है
कितना
कुछ
पर
क्यूँँ
फिर
बस
मैं
ग़म
लिखता
हूँ
तेरे
हँसते
लब
लिखने
को
अपनी
आँखें
नम
लिखता
हूँ
जब
छा
जाती
है
तन्हाई
बीयर
व्हिस्की
रम
लिखता
हूँ
ख़्वाबों
की
बस्ती
है
जिस
में
मैं
और
तुम
को
हम
लिखता
हूँ
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Sarvjeet Singh
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करने
को
तो
क्या
काम
नहीं
कर
सकता
मैं
पर
तेरा
साथ
मिले
तो
अच्छा
लगता
है
Sarvjeet Singh
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आप
हैं
आक़िल
बहुत
ही
और
हम
जाहिल
बहुत
ही
निभ
न
पाएगा
ये
रिश्ता
यार
यूँँ
मत
मिल
बहुत
ही
फिर
मुहब्बत
कर
रहा
है
बावला
है
दिल
बहुत
ही
डूबना
भी
है
मगर
फिर
पास
है
साहिल
बहुत
ही
ज़िन्दगी
आसान
है
पर
लोग
हैं
मुश्किल
बहुत
ही
चल
पड़े
हैं
इक
सफ़र
पर
दूर
है
मंज़िल
बहुत
ही
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Sarvjeet Singh
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ग़ज़लें
रोज़
बनाया
कर
ग़म
मत
ऐसे
ज़ाया'
कर
Sarvjeet Singh
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