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Sandeep Gandhi Nehal
yaar meraa rootha ghazal kahni padi
yaar meraa rootha ghazal kahni padi | यार मेरा रूठा ग़ज़ल कहनी पड़ी
- Sandeep Gandhi Nehal
यार
मेरा
रूठा
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
प्यार
मेरा
टूटा
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
सब
दिखावा
है
और
सब
के
सब
झूटे
ये
जहाँ
है
झूटा
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
मैं
भरोसा
किया
उसी
पर
और,
वो
ज़िंदगी
ही
फूँका
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
साथ
चलने
के
वायदे
थे
हर
क़दम
यूँँं
मिला
ना
धोका
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
मैं
मोहब्बत
करता
रहा
"नेहाल"
वो
इक
दफ़ा
ना
सोचा
ग़ज़ल
कहनी
पड़ी
- Sandeep Gandhi Nehal
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दे
रहे
हैं
लोग
मेरे
दिल
पे
दस्तक
बार
बार
दिल
मगर
ये
कह
रहा
है
सिर्फ़
तू
और
सिर्फ़
तू
Fareeha Naqvi
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कोई
शहर
था
जिसकी
एक
गली
मेरी
हर
आहट
पहचानती
थी
मेरे
नाम
का
इक
दरवाज़ा
था
इक
खिड़की
मुझको
जानती
थी
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Ali Zaryoun
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शायद
किसी
बला
का
था
साया
दरख़्त
पर
चिड़ियों
ने
रात
शोर
मचाया
दरख़्त
पर
Abbas Tabish
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जब
फागुन
रंग
झमकते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
और
दफ़
के
शोर
खड़कते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
Nazeer Akbarabadi
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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बाहरस
उतना
ही
शोर
मचाता
है
जो
अंदर
से
जितना
ख़ाली
होता
है
Sadia Sawera
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वो
शांत
बैठा
है
कब
से
मैं
शोर
क्यूँँॅं
न
करूँॅं
बस
एक
बार
वो
कह
दे
कि
चुप
तो
चूँ
न
करूँॅं
Charagh Sharma
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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हर
क़दम
हर
साँस
गिरवी
ज़िंदगी
रहम-ओ-करम
इतने
एहसानों
पे
जीने
से
तो
मर
जाना
सही
Ajeetendra Aazi Tamaam
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दीवारों
पर
दस्तक
देते
रहिएगा
दीवारों
में
दरवाज़े
बन
जाएँगे
Kunwar Bechain
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यूँं
"उर्दू"
की
मिठास
उतरे
की
सब
कि
मीठी
ज़बान
हो
जाए
Sandeep Gandhi Nehal
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ख़्वाहिशें
कांच
की
बनी
हैं
ना
कांच
आख़िर
में
चूर
होता
है
Sandeep Gandhi Nehal
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ग़मों
के
ये
बादल
बरसते
रहेंगे
मोहब्बत
की
ख़ातिर
तरसते
रहेंगे
मेरे
अश्क
बन
के
वफ़ाओं
के
मोती
यूँँ
आँखों
से
मेरी
छलकते
रहेंगे
अगर
जो
मिरे
आप
हो
ना
सकें
तो
यहाँ
से
वहाँ
हम
भटकते
रहेंगे
भले
ही
जलेंगे
भले
ही
मरेंगे
सुनो
आप
ख़ातिर
तड़पते
रहेंगे
कमी
से
तुम्हारी
करें
ख़ुद-कुशी
गर
तो
हर
रोज़
फाँसी
लटकते
रहेंगे
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Sandeep Gandhi Nehal
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ये
घर
का
बोझ
कितना
है
समझ
आया
उठाने
पर
Sandeep Gandhi Nehal
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दिखनें
में
है,
सीधी
लड़की
लेकिन
है
वो,
ज़िद्दी
लड़की
मुझ
को
हरदम,
तड़पाती
है
अपनी
माँ
की
बिगड़ी
लड़की
उस
पर
लिखता
ग़ज़लें
प्यारी
सब
कुछ
है
वो
पगली
लड़की
हम
को
छोड़ा
घर
की
ख़ातिर
या'नी
है
वो,
असली
लड़की
वा'दा
था
इक
संग
जीने
का
'मज़बूरी'
में,
बदली
लड़की
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Sandeep Gandhi Nehal
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