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Sandeep Gandhi Nehal
ye ghar ka bojh kitna hai
ye ghar ka bojh kitna hai | ये घर का बोझ कितना है
- Sandeep Gandhi Nehal
ये
घर
का
बोझ
कितना
है
समझ
आया
उठाने
पर
- Sandeep Gandhi Nehal
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कुल
जोड़
घटाकर
जो
ये
संसार
का
दुख
है
उतना
तो
मिरे
इक
दिल-ए-बेज़ार
का
दुख
है
शाइर
हैं
तो
दुनिया
से
अलग
थोड़ी
हैं
लोगों
सबकी
ही
तरह
हमपे
भी
घर
बार
का
दुख
है
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Ashutosh Vdyarthi
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जो
बुजुर्गों
की
दु'आओं
के
दीयों
से
रौशन
रोज़
उस
घर
में
दीवाली
का
जश्न
होता
है
Pratap Somvanshi
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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मौत
न
आई
तो
'अल्वी'
छुट्टी
में
घर
जाएँगे
Mohammad Alvi
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उन
के
होने
से
बख़्त
होते
हैं
बाप
घर
के
दरख़्त
होते
हैं
Unknown
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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गुमान
है
या
किसी
विश्वास
में
है
सभी
अच्छे
दिनों
की
आस
में
है
ये
कैसा
जश्न
है
घर
वापसी
का
अभी
तो
राम
ही
वनवास
में
है
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Azhar Iqbal
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उस
पर
लिखता
ग़ज़लें
प्यारी
सब
कुछ
है
वो
पगली
लड़की
Sandeep Gandhi Nehal
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काश
ऐसा
संयोग
हो
जाए
दूर
सारे
वियोग
हो
जाए
प्यार
में
हूँ,
मरीज़
बन
बैठा
आपको
भी
ये
रोग
हो
जाए
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Sandeep Gandhi Nehal
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इक
हसीं
सा
गुनाह
करते
हैं
साथ
आओ
निबाह
करते
हैं
अस्ल
में
तो
है
ही
नहीं
मुमकिन
ख़्वाब
में
ही,
विवाह
करते
हैं
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Sandeep Gandhi Nehal
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दिखनें
में
है,
सीधी
लड़की
लेकिन
है
वो,
ज़िद्दी
लड़की
मुझ
को
हरदम,
तड़पाती
है
अपनी
माँ
की
बिगड़ी
लड़की
उस
पर
लिखता
ग़ज़लें
प्यारी
सब
कुछ
है
वो
पगली
लड़की
हम
को
छोड़ा
घर
की
ख़ातिर
या'नी
है
वो,
असली
लड़की
वा'दा
था
इक
संग
जीने
का
'मज़बूरी'
में,
बदली
लड़की
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Sandeep Gandhi Nehal
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जिस्म
थकता
कभी
नहीं
यारों
बस
दिमाग़ी
थकान
होती
है
Sandeep Gandhi Nehal
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