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Sandeep dabral 'sendy'
isliye eid ka karta hooñ intizaar
isliye eid ka karta hooñ intizaar | इसलिए ईद का करता हूँ इंतिज़ार
- Sandeep dabral 'sendy'
इसलिए
ईद
का
करता
हूँ
इंतिज़ार
ताकि
अपने
पिता
के
गले
लग
सकूँ
- Sandeep dabral 'sendy'
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मरने
के
डर
से
जीना
छोड़
नहीं
सकते
हम
ज़िम्मेदारी
से
अब
मुख
मोड़
नहीं
सकते
हम
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अनोखी
कश्मकश
में
हूँ,
कि
क्यूँ
ये
चश्म
नम
है
न
जीने
की
ख़ुशी
है
याँ
न
मरने
का
ही
ग़म
है
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याद
यहाँ
सिरहाने
मेरे
आकर
बैठा
करती
है
ग़ुस्से
में
वो
तनकर
भौंहें
रोब
जमाया
करती
है
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केवल
इतनी
सी
इनायत
हो
जाए
याँ
उसको
मेरी
आदत
हो
जाए
आसान
नहीं
भू
नभ
का
इक
होना
कुछ
कर
मौला
वो
इक
मत
हो
जाए
होने
को
तो
हो
सकता
है
कुछ
भी
पर
उसको
मुझ
सेे
मुहब्बत
हो
जाए
उस
गुल
से
अपना
घर
महकाना
है
चाहे
दुनिया
से
बग़ावत
हो
जाए
उसको
पाने
की
ख़ातिर
अब
चाहे
इक
दो
सपनों
की
शहादत
हो
जाए
महफ़ूज़
रखूँगा
अपनी
तिजोरी
में
इक
बार
वो
मेरी
दौलत
हो
जाए
झुमके
पायल
चूड़ी
बिंदी
काजल
याँ
नाम
मिरे
उसकी
नथ
हो
जाए
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सुब्ह
होने
में
ज़माने
लगते
हैं
हिज्र
में
जब
दर्द
खाने
लगते
हैं
ख़ून
कम
होने
लगे
मुफ़लिस
का
तब
जब
गगन
में
मेघ
छाने
लगते
हैं
जब
सितारे
होते
हैं
गर्दिश
में
तब
लोग
अपने
आज़माने
लगते
हैं
ग़ैर
से
उम्मीद
हम
क्या
ही
करें
दूर
जब
अपने
ही
जाने
लगते
हैं
साल
होते
पाँच
पूरे
जैसे
ही
दीन
उनको
याद
आने
लगते
हैं
दीन
बस्ती
में
सियासत-दाँ
चुनाव
आते
ही
तब
भिनभिनाने
लगते
हैं
डोर
जब
कमज़ोर
हो
कानून
की
चोर
भी
आँखें
दिखाने
लगते
हैं
जब
अचानक
छोड़
देती
साथ
माँ
बोझ
सब
बापू
के
शाने
लगते
हैं
मूँद
ले
आँखें
पिता
जब,
तब
यहाँ
घर
के
छोटू
भी
कमाने
लगते
हैं
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