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SALIM RAZA REWA
jisse raushan meri subh-o-shaam hai
jisse raushan meri subh-o-shaam hai | जिस सेे रौशन मेरी सुब्ह-ओ-शाम है
- SALIM RAZA REWA
जिस
सेे
रौशन
मेरी
सुब्ह-ओ-शाम
है
मेरे
होटों
पे
फ़क़त
वो
नाम
है
इस
तरह
धड़कन
में
तेरा
नाम
है
जिस
तरह
राधा
के
दिल
में
श्याम
है
तू
मिला
मुझको
तो
सब
कुछ
मिल
गया
ये
मुक़द्दर
का
बड़ा
इनआम
है
हम
किसी
से
दुश्मनी
करते
नहीं
दोस्ती
तो
प्यार
का
पैग़ाम
है
दोस्ती
उस
सेे
मुनासिब
है
नहीं
शहर
की
गलियों
में
जो
बदनाम
है
लोग
कहते
हैं
बुरा
कहते
रहें
साफ़-गोई
ही
हमारा
काम
है
- SALIM RAZA REWA
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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मौत
ही
इंसान
की
दुश्मन
नहीं
ज़िंदगी
भी
जान
ले
कर
जाएगी
Arsh Malsiyani
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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तेरे
वादे
से
प्यार
है
लेकिन
अपनी
उम्मीद
से
नफ़रत
है
पहली
ग़लती
तो
इश्क़
करना
थी
शा'इरी
दूसरी
हिमाक़त
है
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Mehshar Afridi
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अब
दोस्त
कोई
लाओ
मुक़ाबिल
में
हमारे
दुश्मन
तो
कोई
क़द
के
बराबर
नहीं
निकला
Munawwar Rana
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दुश्मनी
जम
कर
करो
लेकिन
ये
गुंजाइश
रहे
जब
कभी
हम
दोस्त
हो
जाएँ
तो
शर्मिंदा
न
हों
Bashir Badr
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उस
के
दुश्मन
हैं
बहुत
आदमी
अच्छा
होगा
वो
भी
मेरी
ही
तरह
शहर
में
तन्हा
होगा
Nida Fazli
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इस
आ
समाँ
को
मुझ
सेे
है
क्या
दुश्मनी
"अली"?
भेजूं
अगर
दु'आ
भी
तो
सर
पर
लगे
मुझे
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Ali Rumi
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उस
दुश्मन-ए-वफ़ा
को
दु'आ
दे
रहा
हूँ
मैं
मेरा
न
हो
सका
वो
किसी
का
तो
हो
गया
Hafeez Banarasi
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ये
सच
है
नफ़रतों
की
आग
ने
सब
कुछ
जला
डाला
मगर
उम्मीद
की
ठण्डी
हवाएँ
रोज़
आती
हैं
Munawwar Rana
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कितना
बे-रंग
ये
ज़माना
है
आसमानों
में
घर
बनाना
है
मैं
ज़मीनों
से
उठ
गया
कब
का
अब
फ़लक
मेरा
आशियाना
है
तेरी
उल्फ़त
की
ओढ़
कर
चादर
सारी
दुनिया
से
दूर
जाना
है
कोई
ख़्वाहिश
नहीं
न
कोई
ग़म
अपना
अंदाज़
सूफ़ियाना
है
मुश्किलों
से
निबाह
कर
लूँगा
साथ
तुझको
मगर
निभाना
है
ग़म
फ़क़त
ही
नहीं
है
दामन
में
चंद
ख़ुशियों
का
भी
ख़ज़ाना
है
मुझको
ख़्वाहिश
है
उस
सेे
मिलने
की
उसके
होंटों
पे
बस
बहाना
है
एक
दिन
ख़्वाब
में
ही
आ
जाओ
तुमको
फिर
से
गले
लगाना
है
दिल
ये
कहता
है
तुम
चले
आओ
आज
मौसम
बड़ा
सुहाना
है
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त
सँभाले
क्यूँ
न
'रज़ा'
अपने
जीने
का
ये
बहाना
है
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SALIM RAZA REWA
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ख़राबी
के
नज़ारे
उग
रहे
हैं
मुनाफ़े
में
ख़सारे
उग
रहे
हैं
तेरे
होटों
पे
कलियाँ
खिल
रही
हैं
मेरे
आँखों
में
तारे
उग
रहे
हैं
फ़लक
चू
में
है
धरती
के
लबों
को
कि
धरती
से
किनारे
उग
रहे
हैं
तुम्हारे
इश्क़
में
जलने
की
ख़ातिर
बदन
में
कुछ
शरारे
उग
रहे
हैं
फ़लक
के
चाँद
को
छूने
की
ज़िद
में
'रज़ा
जी'
पर
हमारे
उग
रहे
हैं
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मौसमों
का
इशारा
है
आ
जाइए
ख़ूब-सूरत
नज़ारा
है
आ
जाइए
ऐसा
मौक़ा'
हसीं
जाने
कब
आएगा
धड़कनों
ने
पुकारा
है
आ
जाइए
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SALIM RAZA REWA
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रौनक़ें
नहीं
जातीं
मेरे
घर
के
आँगन
से
दिल
अगर
नहीं
बँटता
घर
बँटा
नहीं
होता
SALIM RAZA REWA
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इलाज-ए-इश्क़
मुसलसल
जो
कर
गए
होते
दिलों
के
ज़ख़्म
यक़ीनन
ही
भर
गए
होते
तुम्हारे
इश्क़
ने
मुझको
बचा
लिया
वर्ना
ग़म-ए-हयात
से
अब
तक
तो
मर
गए
होते
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SALIM RAZA REWA
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