khayaalaat-o-ehsaas | ख़यालात-ओ-एहसास

  - Sabeela Inam Siddiqui
ख़यालात-ओ-एहसास
जोबे-साख़्तालिखदिएहैं
जानेवोकबसेदिल-ओ-जाँकेअंदरछुपेथे
किसीराज़जैसे
क़लम-बंदहोनेकोबेचैनथे
कईदर्दउलझेसवालात
जोसफ़्हेपेसजनेकोबेताबथे
वोसब
क़लमसेमिरेमोतियोंकीतरह
अबबरसनेलगेहैं
सभीरक़्सकरनेलगेहैं
मिरीचश्म-ए-पुर-नम
जोसैलाबरोकेहुएहै
सितारेचमकतेहैंमेरीपलकपर
उन्हेंमैंरक़मकररहीहूँ
जोतूफ़ानहैमौजज़नमेरेअंदर
वोअरमानवोख़्वाब
कईला-शुऊरीमज़ामीनबनकर
वरक़-दर-वरक़जगमगानेलगेहैं
सभीरक़्सकरनेलगेहैं
औरअब
उसीजज़्ब-ओ-एहसासकेज़ेर-ए-साया
ग़ज़लफूलबनकरमहकतीहै
कभीनज़्मगातीहैवोगीत
किजोबे-ख़यालीमेंतख़्लीक़होकर
बनातीहैरंगीनपैकर
येबज़्म-ए-सुख़नकोसजानेपेमाइल
ख़यालातसबरक़्सकरनेलगेहैं
क़लमसेमिरेमोतियोंकीतरह
अबबरसनेलगेहैं
सभीरक़्सकरनेलगेहैं
  - Sabeela Inam Siddiqui
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