idraak hi muhaal hai khwaab-o-khayaal ka | इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

  - Sabeela Inam Siddiqui
इदराकहीमुहालहैख़्वाब-ओ-ख़यालका
दिलकेवरक़पेअक्सहैउसकेजमालका
रोतीनहींहूँमैंकभीदुनियाकेसामने
रखतीहूँहौसलामैंनिहायतकमालका
हैंमरहलेअजीबयेईश्क़-ओ-ख़िरदकेभी
लम्होंमेंकररहीहूँसफ़रमाह-ओ-सालका
दरवेशहैकोईतोक़लंदरवलीकोई
बंदोंनेपायाइश्क़मेंरुत्बाकमालका
इतनेसुकूँसेमैंनेकियाइश्क़कासफ़र
आयानहींगुमानकिसीएहतिमालका
कैसाअजीबदौरहैमौजूदादौरभी
मफ़्हूमकोईसमझेदिलकेसवालका
दमघुटरहाहोजबमिराअपनेवजूदमें
क्याख़ाकतज़्किराहोफ़िराक़-ओ-विसालका
करतीनहीं'सबीला'गिलामैंयेसोचकर
साथीनहींयहाँकोईरंज-ओ-मलालका
  - Sabeela Inam Siddiqui
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