baad-e-sarsar bhi qurbat ki chalti rahe din nikalta rahe shaam dhalti rahe | बाद-ए-सरसर भी क़ुर्बत की चलती रहे दिन निकलता रहे शाम ढलती रहे

  - Sabeela Inam Siddiqui
बाद-ए-सरसरभीक़ुर्बतकीचलतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
ज़ुल्फ़हाथोंसेतेरेसँवरतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
तेरीचाहतगुलाबोंकीख़ुश्बूबनेमेरेदीवार-ओ-दरमेंकुछऐसीबसे
तेरीमहकारकमरेसेआतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
तेरेएहसासकीतनपेचादरलिएतेरेहमराहरक़्साँमेंऐसेरहूँ
प्यारकीमुझपेबदलीबरसतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
रूहसेरूहकारब्तऐसाबनेजैसेहाथोंमेंतेरेमिराहाथहो
फिरमुलाक़ातख़्वाबोंमेंहोतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
मेरीग़ज़लोंमेंतेराहीमज़मूनहोमेरीनज़्मोंमेंतोमुझसेबातेंकरे
यूँँबयाज़-ए-तमन्नाभीभरतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
प्यारकेसातरंगोंकीक़ौस-ए-क़ुज़हलेकेआए'सबीला'वोमिलनेकभी
ज़िंदगीफिरवहींरुककेहँसतीरहेदिननिकलतारहेशामढलतीरहे
  - Sabeela Inam Siddiqui
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