kitaab-e-dil ka tiri intisaab baaki hai | किताब-ए-दिल का तिरी इंतिसाब बाक़ी है

  - Sabahat Asim
किताब-ए-दिलकातिरीइंतिसाबबाक़ीहै
हक़ीक़तोंसेअलगएकख़्वाबबाक़ीहै
वोइश्क़भूलगएजिसकोतुमउसीकेलिए
हमारेदिलमेंअभीइज़्तिराबबाक़ीहै
जहानकमथाकिदोज़ख़भीइकबनाडाली
इलाहीकौनसाऐसाअज़ाबबाक़ीहै
अगरसुनाऊँहदीस-ए-जुनूँतोचंदअल्फ़ाज़
लिखूँअगरतोयेपूरीकिताबबाक़ीहै
हमारेसाथतोचलतसफ़ियाहुआतेरा
ठहरकितुझसेहमाराहिसाबबाक़ीहै
येबहसछोड़िएमुजरिमहूँयानहींकीजे
जोरहगयाहैसितमजोइताबबाक़ीहै
हुआतमामसफ़रदश्तकामगर'आसिम'
लबोंपेरेतनज़रमेंसराबबाक़ीहै
  - Sabahat Asim
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