dil-e-muztar ko samjha luun bahut hai | दिल-ए-मुज़्तर को समझा लूँ बहुत है

  - Saba Naqvi
दिल-ए-मुज़्तरकोसमझालूँबहुतहै
मैंख़ुदसेअपनाघरछालूँबहुतहै
मैंअपनीज़िंदगी-ए-बेवफ़ाको
वफ़ाकेजाममेंढालूँबहुतहै
भिगोकरआँसुओंसेअपनाचेहरा
सफ़रकीगर्दधोडालूँबहुतहै
सुकूत-ए-अंजुमनटूटेटूटे
ब-शौक़-ए-ज़मज़मागालूँबहुतहै
नवाह-ए-ज़िंदगीमेंइकज़रासा
फ़रेब-ए-दोस्तीखालूँबहुतहै
कोईभूलासबक़पारीनाक़िस्सा
मैंदिलहीदिलमेंदोहरालूँबहुतहै
जाएराएगाँज़ौक़-ए-तजस्सुस
मैंअपनेआपकोपालूँबहुतहै
जोसंग-ए-मीलरहज़नकेलिएहै
वोसंग-ए-राहउठवालूँबहुतहै
'सबा'दीवार-ए-ज़िंदान-ए-बलासे
मैंअपनेसरकोटकरालूँबहुतहै
  - Saba Naqvi
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