afkaar ke saanche men dhali taaza ghazal hai | अफ़्कार के साँचे में ढली ताज़ा ग़ज़ल है

  - Saba Naqvi
अफ़्कारकेसाँचेमेंढलीताज़ाग़ज़लहै
यावक़्तकेपेचीदासवालातकाहलहै
येसंगकीबुनियादपेता'मीरहोगा
येमेरेतख़य्युलकाहसींशीश-महलहै
मैंअपनीमोहब्बतकाबदलढूँडरहाहूँ
वोकौनहैजोमेरीमोहब्बतकाबदलहै
तार-ए-नफ़सटूटभीजादेरकरअब
एहसासकीबालींपेखड़ीकबसेअजलहै
जोअर्सा-ए-माज़ीहैमुअर्रिख़कीनज़रमें
शाइ'रकीनिगाहोंमेंवोगुज़राहुआपलहै
जोहिज्रकेमौसममेंखुलेदाग़कीसूरत
वोफूलब-अल्फ़ाज़-ए-दिगरआगकाफलहै
मैंदर्स-ए-तहम्मुलहूँ'सबा'राह-ए-तलबमें
दुनियायेसमझतीहैकिबाज़ूमिराशलहै
  - Saba Naqvi
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