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Rizwan Khoja "Kalp"
kya lutf azaa
kya lutf azaa | क्या लुत्फ़ आज़ादी का है
- Rizwan Khoja "Kalp"
क्या
लुत्फ़
आज़ादी
का
है
अब
भी
ग़ुलामी
जारी
है
- Rizwan Khoja "Kalp"
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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अँधेरों
की
हुक़ूमत
ख़ुद
ब
ख़ुद
ही
ख़त्म
होनी
है
क़लम
को
हाथ
में
शमशीर
के
मानिंद
समझो
तो
Sameer Goyal
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मोहब्बत
की
तो
कोई
हद,
कोई
सरहद
नहीं
होती
हमारे
दरमियाँ
ये
फ़ासले,
कैसे
निकल
आए
Khalid Moin
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उस
मुल्क
की
सरहद
को
कोई
छू
नहीं
सकता
जिस
मुल्क
की
सरहद
की
निगहबान
हैं
आँखें
Unknown
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इस
ज़माने
में
भी
इक
लड़का
तुम्हें
यूँँ
चाहता
है
अपने
रब
से
वो
तुम्हारी
जैसी
बेटी
माँगता
है
तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
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Harsh saxena
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सियाह
रात
की
सरहद
के
पार
ले
गया
है
अजीब
ख़्वाब
था
आँखें
उतार
ले
गया
है
है
अब
जो
ख़ल्क़
में
मजनूँ
के
नाम
से
मशहूर
वो
मेरी
ज़ात
से
वहशत
उधार
ले
गया
है
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Abhishek shukla
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तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
Harsh saxena
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हमने
ग़ज़लों
में
हुक़ूमत
को
लिखी
है
'लानत
धमकियाँ
आती
हैं,
इनआम
तो
आने
से
रहा
Harman Dinesh
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बाज़
बनना
है
तो
फिर
कद
भूल
जा
आँख
में
रख
लक्ष्य
और
हद
भूल
जा
किसलिए
डरता
है
दीवारों
से
तू
आ
समाँँ
को
देख
सरहद
भूल
जा
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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गुलशन
मिले
चुनने
बहुत
से
ख़ार
में
डूबा
दिल-ए-नादाँ
तिरे
ही
प्यार
में
अपनी
जवानी
में
कमाने
आ
गया
मिलता
हूँ
अपने
गाँव
से
अख़बार
में
ओछा
तिरा
लगने
लगा
रंग-ए-जहाँ
रंगों
का
कारोबार
देखा
यार
में
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Rizwan Khoja "Kalp"
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दर्द
की
शाम
ढल
जाएगी
ज़िंदगी
फिर
संभल
जाएगी
रात
भर
शम्अ
जलती
रहे
बाद-ए-सब
में
पिघल
जाएगी
क़त्ल
कर
नीम-कश
चश्म
से
मौत
मेरी
बदल
जाएगी
काम
राही
का
तो
चलना
है
ख़ुद
ब
ख़ुद
राह
मिल
जाएगी
आज
को
जी
लें
मस्ती
से
हम
चाह
ये
भी
निकल
जाएगी
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Rizwan Khoja "Kalp"
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सोचता
हूँ
दर्द
अपने
फूँक
डालूॅं
जिस्म
तेरा
सर्द
रातों
में
जला
कर
Rizwan Khoja "Kalp"
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हालात
ये
है
मुल्क
के
झूठ
अब
तो
सच
पे
भारी
है
Rizwan Khoja "Kalp"
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माह
यूँँ
ही
गुज़रता
तिरी
याद
में
ईद
के
चाँद
सी
है
मुहब्बत
तिरी
Rizwan Khoja "Kalp"
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