zindagi ko zakham ki lazzat se mat mahroom kar | ज़िंदगी को ज़ख़्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर

  - Rahat Indori
ज़िंदगीकोज़ख़्मकीलज़्ज़तसेमतमहरूमकर
रास्तेकेपत्थरोंसेख़ैरियतमा'लूमकर
टूटकरबिखरीहुईतलवारकेटुकड़ेसमेट
औरअपनेहारजानेकासबबमा'लूमकर
जागतीआँखोंकेख़्वाबोंकोग़ज़लकानामदे
रातभरकीकरवटोंकाज़ाइक़ामंज़ूमकर
शामतकलौटआऊँगाहाथोंकाख़ाली-पनलिए
आजफिरनिकलाहूँमैंघरसेहथेलीचूमकर
मतसिखालहजेकोअपनीबर्छियोंकेपैंतरे
ज़िंदारहनाहैतोलहजेकोज़रामा'सूमकर
  - Rahat Indori
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